"रचनात्मकता"
किसी भी
व्यक्ति के अंदर
की वह योग्यता होती है
जिसके द्वारा वह वस्तुओं या
उन विचारों का उत्पादन करता है।
व्यक्ति के अंदर
की वह योग्यता होती है
जिसके द्वारा वह वस्तुओं या
उन विचारों का उत्पादन करता है।
दैनिक जीवन में
किसी नवीन दृष्टिकोण,
विचार या व्यवहार को उत्पन्न
करना रचनात्मकता है।
रचनात्मकता सर्वव्यापी है
प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के
अनुसार इसका उपयोग करता है।
किसी नवीन दृष्टिकोण,
विचार या व्यवहार को उत्पन्न
करना रचनात्मकता है।
रचनात्मकता सर्वव्यापी है
प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के
अनुसार इसका उपयोग करता है।
साहित्यिक पटल रचनात्मकता का सबसे प्रभावशाली उदाहरण है।
अपनी कल्पनाशीलता,अनुभवों, जिज्ञासाओं और गहन चिंतन
के द्वारा सृजित मौलिक विचार जो कविताओं,कहानियों साहित्य
की अन्य विधाओं के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है
यह अद्भुत गुण "रचनात्मकता" है।
अपनी कल्पनाशीलता,अनुभवों, जिज्ञासाओं और गहन चिंतन
के द्वारा सृजित मौलिक विचार जो कविताओं,कहानियों साहित्य
की अन्य विधाओं के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है
यह अद्भुत गुण "रचनात्मकता" है।
कई बार किसी विशेष विचार या रचना से प्रभावित होकर या
प्रेरित होकर अपने शब्दों में एक नवीन सृजन किया जाता है
जिसकी मौलिकता पर प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं।आप बताइये
आप क्या सोचते है इस बिषय पर??
प्रेरित होकर अपने शब्दों में एक नवीन सृजन किया जाता है
जिसकी मौलिकता पर प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं।आप बताइये
आप क्या सोचते है इस बिषय पर??
मेरे विचार से ऐसा सृजन कम से कम उस रचनात्मकता से तो बेहतर है जिसमें किसी प्रतिष्ठित और लोकप्रिय रचना को आधार मानकर
उसमें निहित मौलिक विचारों का अपमान किया जाता है।
उसमें निहित मौलिक विचारों का अपमान किया जाता है।
||सादर नमस्कार||
आप सभी आमंत्रित हैं अपने विचार और सुझाव के साथ।
कृपया "रचनात्मकता" पर अपने विचार अवश्य लिखें।
कृपया "रचनात्मकता" पर अपने विचार अवश्य लिखें।
चलिए आज के हमारे रचनाकारों के सृजन के संसार में.....
तुम पुरुष हो....वरना
व्यर्थ है...
तुम्हारा...यह
व्यक्तित्व....
व्यर्थ है...
तुम्हारा...यह
व्यक्तित्व....
आदरणीय ज्योति खरे जी की कलम से
निसृत सरस प्रेमपगी प्रभावी रचना
निसृत सरस प्रेमपगी प्रभावी रचना
चाहतों के घर-घरोंदे
बैठ सागर के किनारे
कई दिवस कई माह तक
रोज शामों में अकेले
ऊगा दिये थे चाँद-तारे
बैठ सागर के किनारे
कई दिवस कई माह तक
रोज शामों में अकेले
ऊगा दिये थे चाँद-तारे
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आदरणीय पुरुषोत्तम जी की लेखनी की लाजवाब़ अभिव्यक्ति
वक्त के परे, संभावनाएँ हैं अनन्त,
दिशाहीन से वक्त के ये द्वन्द,
छलती रहेंगी हमें, ये दिशाएँ दिग्दिगंत,
आओ चुने हम यहाँ, इन राहों में पड़े मकरंद....
गर हो सके तो मिलो वक्त के परे स्वच्छंद.....
दिशाहीन से वक्त के ये द्वन्द,
छलती रहेंगी हमें, ये दिशाएँ दिग्दिगंत,
आओ चुने हम यहाँ, इन राहों में पड़े मकरंद....
गर हो सके तो मिलो वक्त के परे स्वच्छंद.....
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आदरणीया कुसुम दी की कूची से प्रकृति की मोहक छवि उकेरती रचना
उषा ने सुरमई शैया से
अपने सिंदूरी पांव उतारे
पायल छनकी
बिखरे सुनहरी किरणों के घुंघरू
अपने सिंदूरी पांव उतारे
पायल छनकी
बिखरे सुनहरी किरणों के घुंघरू
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आदरणीया पल्लवी जी की कलम सुंदर प्रार्थना के रंग बिखेरती हुई
राग -द्वेष जीवन का हिस्सा,
कभी न हो ये मेरा किस्सा ।
शत्रु ,मित्र या स्वदेश ,परदेश
दिखे सबमें, तेरा ही वेश ।
कभी न हो ये मेरा किस्सा ।
शत्रु ,मित्र या स्वदेश ,परदेश
दिखे सबमें, तेरा ही वेश ।
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आदरणीय डॉ.हीरालाल प्रजापति जी की परिपक्व व
सधी हुई लेखनी की बात ही निराली है।
सधी हुई लेखनी की बात ही निराली है।
दुश्मन ज़रूर था वो मगर इतना प्यारा था ,
उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !!
सचमुच ही बुलंदी को बस इक बार चूमने ,
ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !!
उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !!
सचमुच ही बुलंदी को बस इक बार चूमने ,
ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !!
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चलते-चलते आदरणीया अपर्णा जी की कलम से भावपूर्ण ख़ूबसूरत रचना
मौसम में थी बेपनाह मोहब्बत
लबों पर जज्बातों की लाली
अलकों में अटका था गुलाबों का स्पर्श
नाचती धरती ने एक ठुमका लगाया
वसंत ने ली अंगडाई
और प्रेम
तारीखों में अमर हो गया.
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आप अपनी रचना शनिवार 17 फरवरी 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 19 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक
11 जनवरी 2018 का अवलोकन करें
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लबों पर जज्बातों की लाली
अलकों में अटका था गुलाबों का स्पर्श
नाचती धरती ने एक ठुमका लगाया
वसंत ने ली अंगडाई
और प्रेम
तारीखों में अमर हो गया.
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चलिए अब बारी है हम-क़दम के
छठवें क़दम की ओर
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
छठवें क़दम की ओर
हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम छठवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:::: खलल ::::
उदाहरणः
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं
चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं
मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं
कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं
ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं
उसकी याद आई हैं साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं
-राहत इंदौरी
आप अपनी रचना शनिवार 17 फरवरी 2018
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक 19 फरवरी 2018 को प्रकाशित की जाएगी ।
इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारे पिछले गुरुवारीय अंक
11 जनवरी 2018 का अवलोकन करें
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