सादर नमस्कार
सदा
अविचल
अविचल
हिमाच्छादित
पहाड़ों के सीने से
निसृत,मौन चट्टानों के
अंतर से प्रवाहित,कल-कल,
छल-छल अपनी ही धुन में बहती
मैं नदी हूँ।

मेरी
समृद्ध
तटों पर
अनेक मानवीय
सभ्यताओं ने जन्म
लिया है। देवी और माता
स्वरूप मानकर पौराणिक काल
से ही मुझे पूजा जाता रहा है।...
परंतु बदलते समय के साथ-साथ आपके
स्वार्थ के दोहन के फलस्वरूप आज मेरी स्थिति
अत्यंत दयनीय है। मैं जीवनदायी,मोक्षदायनी नदी,अब
नित्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या, जीवन के ऊँचे होते मानकों,का
औद्योगिकीकरण, शहरीकरण के फलस्वरूप बढ़ते कचरे ,मल से
प्रदूषित होकर दिन-ब-दिन तिल-तिल मर रही हूँ। ऐसी हालत
एक प्रदेश या राज्य में नहीं पूरे देश में ही मेरा अस्तित्व
संकट में है। करोड़ों रुपयों की नीतियाँ बनाई जाती रही
है मेरे संरक्षण को लेकर पर भी कोई फायदा न हुआ
क्योंकि आप सब का सक्रिय सहयोग मुझे प्राप्त
नहीं। कृपया, इतना अवश्य सोचियेगा
कि मैं मर गयी तो आपके प्राणों
पर भी संकट आ जायेगा।
जरा सोचिये न मेरी
क्षीण होती साँसों
को बचाने
के लिए क्या आप कुछ नहीं कर सकते हैं??
★★★
आइये अब चलते है आपके द्वारा रचे गये सृजनशीलता के संसार में।
आप सभी रचनाकारों की लेखनी से प्रवाहित नदी की कल-कल धारा अनेक साहित्य सुधियो़ के मन को शीतलता प्रदान करेगी।
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कृपया ध्यान दीजिएगा, रचनाएँ क्रमानुसार नहीं
सुविधानुसार लगायी गयीं हैं।
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तो चलिए हम सभी रचनाओं की पावन सरिता में
डुबकी लगाकर कविताओं का का आनंद लेते हैं।
डुबकी लगाकर कविताओं का का आनंद लेते हैं।
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पहली रचना हम सब की ओर सेश्री महेश रौतेला की अप्रतिम रचना
यह भारत है
यह बिहू है
जो मुझे भाता है
सुबह सी अनुभूति दे
ब्रह्मपुत्र का आभास कराता है ।
ये झोड़े हैं
जो मुझे नचाते हैं
स्नेह सा स्पर्श दे
गंगा का ज्ञान दे जाते हैं ।
यह गरबा है
जो मुझ में सनसनाता है
अद्भुत लय दे
साबरमती तक ले आता है ।
यह भारत है
जो मुझे उज्जवल बनाता है
गंगा,यमुना,ब्रह्मपुत्र
नर्मदा,गोदावरी,कावेरी
सिन्धु,व्यास, रावी
सबका संगम मुझमें ढूढ़ंता है ।
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आदरणीया साधना दी
करने आई
उद्धार जगत का
कल्याणी नदी
बहती जाती
अथक अहर्निश
युगों युगों से
जीवनदायिनी है नदिया
कल कल - संगीत मधुर, सुनाती है नदिया.
चाल लिए सर्पिणी- सी , है बलखाती नदिया
ऊसर मरुओं को उर्वर बनाती है नदिया
तृष्णा को सबकी पल में मिटाती है नदिया
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आदरणीया सखी रेणुबाला जी

नदिया तुम नारी सी!!
नदिया तुम नारी सी -
निर्मल, अविकारी सी ,
कहीं जन्मती कहीं मिल जाती -
नियति की मारी सी !!
आप सभी को आज का अंक कैसा लगा
तीन मिनट और
उद्धार जगत का
कल्याणी नदी
बहती जाती
अथक अहर्निश
युगों युगों से
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आदरणीया अपर्णा जी

पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है,
मैदानी बाजारों में काम तलाशता है;
खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि
ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ.
मैदानी बाजारों में काम तलाशता है;
खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि
ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ.
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आदरणीया कुसुम दी

मेरी अनुगूंज विराट तक
चल के गिरती फिर चलती
न रुकती न हारती कभी
गिरना चलना मेरी शान
कभी उदण्ड हो किनारे तोडती
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आदरणीया शुभा दी
तू क्यों है
इतना स्वार्थ मगन
करता क्यों नहीं मेरा जतन
उँडेल कर जमाने का करकट
करता है क्यों मुझको मैला
इतना स्वार्थ मगन
करता क्यों नहीं मेरा जतन
उँडेल कर जमाने का करकट
करता है क्यों मुझको मैला
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आदरणीया नीतू जी

खारे सागर से मिलकर खुद को मिटा लेगी वो
ऐसी बेखौफ दिवानी को कैसे समझाएँ
जनता है वो मगर फिर भी है खामोश अभी
आज सागर का जले दिल तो कैसे समझाएँ
ऐसी बेखौफ दिवानी को कैसे समझाएँ
जनता है वो मगर फिर भी है खामोश अभी
आज सागर का जले दिल तो कैसे समझाएँ
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प्रिय सखी दिबू

तुम्हारे प्रवाह में
स्वयं के अस्तित्व को विलीन कर
सर्वस्व भूलकर बहती हुई
मैं पा लेती हूँ
जीवन नदी का अमृत
स्वयं के अस्तित्व को विलीन कर
सर्वस्व भूलकर बहती हुई
मैं पा लेती हूँ
जीवन नदी का अमृत
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आदरणीय प्रियम् जी

बचपन सी भोली
कोयल की बोली
परियों की कहानी है।
बीच राह हर रोड़े
को चीरती,काटती
हुँकार भरती भवानी है।
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आदरणीया मीना जी

सुनो प्रियतम,
तुमसे मिलकर बाँध टूटा,
बहे झरझर अश्रू के निर्झर !
शायद इसीलिए खारे हुए तुम !
खारेपन की, आँसुओं की
सौगात भी सहेज ली ?
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इक क्षण की विलीनता , पुनः मिले नवजीवन
वाष्पित होना सागर का,पर्वत तक जाना बदरी बन
बरसना पुनः पहाड़ों पर , बहना पुनः नदिया बन
अनमोल सम्पदा जीवन की,सृष्टि चक्र का साथ निभाती
जीवन जैसी ही नदिया निरन्तर बहती जाती.......
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आदरणीय वैभवी जी

जंगल तोड़ रहे
मौन...पहाड़ का
और नदी के
छल-छलाने की
आवाज भी
भंग करती है मौन
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आदरणीया सखी सुधासिंह जी

कल कल - संगीत मधुर, सुनाती है नदिया.
चाल लिए सर्पिणी- सी , है बलखाती नदिया
ऊसर मरुओं को उर्वर बनाती है नदिया
तृष्णा को सबकी पल में मिटाती है नदिया
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आदरणीया सखी रेणुबाला जी

नदिया तुम नारी सी!!
नदिया तुम नारी सी -
निर्मल, अविकारी सी ,
कहीं जन्मती कहीं मिल जाती -
नियति की मारी सी !!
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आप सभी के अमूल्य सहयोग से हमक़दम के
आगे का सफ़र निर्बाध निरंतर जारी रहेगा ऐसी उम्मीद करते हैं।
आप सभी को आज का अंक कैसा लगा
कृपया अपने विचार अवश्य प्रेषित करें।
आपकी प्रतिक्रियाएं हमारा मनोबल बढ़ाती हैं।

