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शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

932... कद्रदां





इकाई सबके साथ मिल सैकड़ों में शामिल हो सकती थी
लेकिन काश में फँस हम स्त्रियाँ
मौका के साथ वजूद खोना स्वीकार करती हैं

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
और
एक दिन विलम्ब से अनुजा स्वामी
आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी को
जन्मदिन की हार्दिक बधाई
कल दिन भर सोचती रह गई
कि कहाँ संदेश दूँ कि लगूँ

माना की हैं वो जागीर तुम्हारी,पर हैं  कद्रदान "उनकी"
                                  निगाहे हमारी
अदाएं दिखाना,अदावों से,अदावों की मल्लिका, बस हैं
                            एक यहीं आरजू हमारी
उछाल दो जो "मुस्कान"  सुर्ख, सतरंगी, लाल,  होठों से,
                  तबियत दुरुस्त हो जाऐंगी हमारी

मेरे चश्म जहाँ नम ना हुए,
मोहल्ले की कोई दर ना थी

तू याद ना आये इक लम्हा,
ऐसी ये दियार ए सहर ना थी





पाठकों के लिए खुला मंच है हमारा नया कार्यक्रम 
"हम-क़दम"
इसकी नवीनतम कड़ी में हमने आपको सृजन के लिए दिया है शब्द 
"इंद्रधनुष"
उदाहरणः
इंद्रधनुष,
आज रुक जाओ जरा,
दम तोड़ती, बेजान सी
इस तूलिका को,
मैं रंगीले प्राण दे दूँ,
रंगभरे कुछ श्वास दे दूँ !
पूर्ण कर लूँ चित्र सारे,
रह गए थे जो अधूरे !
इस कार्यक्रम में भागीदारी के लिए 
आपका ब्लॉगर होना ज़रूरी नहीं है। 
इस विषय पर आप अपनी रचनाऐं हमें
आज शनिवार 3 फरवरी 2018 शाम 5 बजे तक
भेज सकते हैं। 
 चुनी गयी रचनाऐं 

आगामी सोमवारीय अंक 5 फरवरी 2018 में प्रकाशित होंगीं। 

इस विषय पर सम्पूर्ण जानकारी हेतु हमारा पिछला गुरुवारीय अंक 





दिखाने के लिये लोग अहसान करते हैं
नाम मदद, पर कीमत मांगते हैं सभी।।

रोटियों का ढेर भले भरा हो जिनके गले तक 
उनकी भूख का शेर पिंजरे में नहीं जाता कभी।।



हाले धरती,देख कर ही रो पड़े,
दूर से ये आस्मां भी , क्या करें !

झाँकने ही झांकने , में फट गए , 
ये हमारे गिरेबां भी , क्या करें !



इज्ज़त देना दूसरों को दुगनी जितनी चाहते हो अपने लिए,
फिर देखना कैसे मिलता है तुम्हे मान-सम्मान – ज़िंदगी में I
जो बांधते रहते हैं पुल तारीफों के तुम्हारी, मिलना जरुर उनसे,
बहुत कम रह गए हैं अब तो दुनिया में असली कद्रदान – ज़िंदगी में I



आइये कद्रदान लेकर आया सियासत की दुकान
झोपड़ियां दूंगा तुमको छीन कर के तुम्हारे मकान

फिर मिलेंगे... पलक झपका लीजिये... यूँ गई यूँ आई...



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