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गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

881....मौत का मंतर न फेंक....

   सादर अभिवादन।    
नया साल आने में 17 और शेष........  

आजकल देश में बड़े निजी अस्पताल अपने क्रिया-कलापों से चर्चा में हैं।आम आदमी चिकित्सा-क्षेत्र की बारीकियों से अनभिज्ञ होता है अतः निजी अस्पतालों में क़दम-क़दम पर लुटता है।  डॉक्टर और मरीज़ के बीच विश्वास का रिश्ता धीरे-धीरे ख़ात्मे की ओर है।  सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्था , अधिक समय लगना ,गंदगी , साधनों की कमी, स्टाफ़ के दुर्भावनापूर्ण रबैये , कोई जवाबदेही न होना आदि  के चलते लोग  निजी अस्पतालों में जाना पसंद करते हैं और कुछ तो मज़बूरन भी वहां जाते हैं। देश के नामी कॉर्पोरेट अस्पताल इस समय जनता के समक्ष अपनी विकृत तस्वीर लेकर सामने आये हैं।  मरीज़ के मर जाने पर भी 16 लाख रुपये  का बिल, हाल ही पैदा हुआ कम दिनों का बच्चा ज़िंदा था उसे मृत घोषित करना , बिल का शेष भुगतान न करने पर लाश  मृत मरीज़ के परिजनों को न सौंपना, महिला  मरीज़ के साथ  ICU में छेड़छाड़ , बिलिंग में धाँधली आदि गंभीर ख़ामियाँ जनता के समक्ष आयीं हैं निजी अस्पतालों की।ये निजीकरण के भयावह दुष्परिणाम हैं।  
आप भी मनन कीजिये इस मुद्दे पर और दुआ कीजिये कि आपको अस्पतालों की शरण में न जाना पड़े। 

मैं ख़ुद इस क्षेत्र का प्रोफ़ेशनल हूँ अपने स्तर पर पारदर्शिता 
बनाये रखने में अब तक ईश्वरीय कृपा मेरे साथ है।
शीध्र ही प्लेटलेट्स और डेंगू पर जनहित में एक विस्तृत लेख प्रस्तुत करने वाला हूँ जिससे अवश्य ही पीड़ित मानवता को राहत मिलेगी।  इस लेख में मेरी कोशिश जनता और सरकार को यह बताने की है कि डेंगू के मामलों में AUTOMATED HEAMATOLOGY ANALYSER द्वारा GENERATE की जा रही रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सा-क्षेत्र में  फ़ैसला लेकर मरीज़ को प्लेटलेट्स TRANSFUSION कर दिया जाता है जबकि MANUAL आधार ( इस प्रक्रिया में समय लगता है )  पर प्लेटलेट्स की जाँच करने पर ऐसा करना ज़रूरी नहीं होता है कभी-कभी  क्योंकि ANALYSER डेंगू मरीज़ में प्लेटलेट्स के आकार में आये परिवर्तन के कारण पूरे प्लेटलेट्स नहीं गिन पाता। मेरे इस कार्य  के आधार पर  अस्पताल के सभी विशेषज्ञ मेरे द्वारा सुझाई गयी रिपोर्ट पर विश्वास करते हैं और हम सैकड़ों मरीज़ों को बिना प्लेटलेट्स TRANSFUSION के संकट से उबार चुके हैं।

आइये अब आपको अलग दुनिया की सैर पर ले चलते हैं अर्थात आज की सात  पसंदीदा रचनाऐं - 

नामचीन शायर डॉ. कुँवर बेचैन जी की एक शानदार  ग़ज़ल आदरणीया यशोदा बहन जी द्वारा "मेरी धरोहर " ब्लॉग पर संकलित जो आपको नए-नए अर्थों से अवगत कराएगी।  मुलाहिज़ा कीजिये-


मौत का मंतर न फेंक....डॉ. कुंवर बेचैन

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक
फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

आइये आपको रूबरू कराते हैं एक  अलग बिषय से  जोकि  आपको भी जानना चाहिए।  पेश है आदरणीय ललित गर्ग जी का सारगर्भित एवं  विचारणीय आलेख -




भारत दुनिया में सबसे बड़ा गैर लाभकारी संगठनों का घर है जहां 33 लाख गैर सरकारी संगठन प्रति वर्ष अंतर्राष्ट्रीय दाताओं से 8500 करोड़ रुपये से अधिक का धन जुटाते हैं। दान और परोपकार के माध्यम से करों में लाभ प्राप्त किया जा सकेगा। ग्लोबलगिविंग के साथ हुए करार से अमेरिका और ब्रिटेन के भारतीय दाताओं को कर छूट की सुविधा प्राप्त हो सकेगी और इस तरह भारत के गैर सरकारी संगठनों एवं सामाजिक उद्यमों को अधिक लोकोपकारी एवं जनकल्याणकारी कार्यों के लिए प्रवासी भारतीयों से पूंजी जुटाने की सकारात्मक स्थितियों का बनना देश के लिये शुभ है। 


इस मंच पर आज हम परिचय करा रहे हैं नवोदित युवा रचनाकार सालिहा मंसूरी जी का जोकि न्यूनतम अल्फ़ाज़ में जज़्बात को  ख़ूबसूरत अंदाज़ में पेश करने में माहिर हैं - 


Profile photo

आज फिर तन्हा हूँ मैं
तुमसे बिछड़कर
लेकिन कुछ पल
जैसे आज भी जिन्दा हैं
कुछ लम्हें 
जैसे आज भी ठहरे हैं ....

बदलते वक़्त में मूल्यों की नयी परिभाषाऐं बन रही हैं।  प्रेम को हालात से जोड़ती और राधा-कृष्ण के अमर व  अलौकिक प्रेम का ज़िक्र करती आदरणीय राकेश कुमार श्रीवास्तव  "राही" जी की ताज़ातरीन रचना पर नज़र डालिये 


हमारा न था कभी भी,
जिस्मानी रिश्ता,  
आत्मिक रिश्तों को,
ना समझोगे कभी भी। 

गुजर रहा अभी,
जीवन, ख़ुशी में “राही”,
शक राधा-कृष्ण पर,   
न करता कोई भी। 

वक़्त को न थामा जा सकता है और न ही उसे आगे-पीछे किया जा सकता है बल्कि उसकी अपनी निर्धारित गति है जबकि सुखमय पलों को हम ठहरने की कामना करते हैं। रचनाकारों की ख़्वाबों से सजी  आल्हादित करतीं फैंटेसी से लबरेज़ उड़ानें वक़्त को  थामकर उसमें एहसासों की नज़ाक़त भर देती हैं।  पेश है आदरणीया नीतू ठाकुर जी की एक मनमोहक रचना -


चल ख्वाबों के पंख लगाकर 
नील गगन में उड़ते जायें 
तारों से रोशन दुनिया में 
सपनों का एक महल बनायें 
जहाँ बहे खुशियों का सागर 
फूलों की खुशबू को समाये 

हास्य-विनोद माहौल को हल्का-फुल्का बनाता है। व्यंग के माध्यम से व्यक्ति हँसकर सच्चाई स्वीकार  कर लेता है। पेश है आदरणीय जोशी सर की उनके ब्लॉग  "उलूक टाइम्स" से  एक रचना जो आपसे सीधा संवाद करती है  अंत में आपको गंभीरता के सरोबर में डुबो देती है -


सीखता क्यों नहीं है 
एक पूरी भीड़ से 
जिसने अपने लिये 
सोचने के लिये 
कोई किराये पर 
लिया होता है 

स्त्री की समाज में स्थिति को लेकर साहित्य अक्सर गंभीर रहा है। 
और अंत में...आदरणीया सुधा देवरानी जी की इस ख़ूबसूरत रचना के भाव स्त्री को गर्वोन्नत होने की भावभूमि पर खड़े होने का आधार प्रदान करते हैं -

हिम्मत कर निकली जब बाहर,
देहलीज लाँघकर आँगन तक ।
आँगन खुशबू से महक उठा,
फूलों की बगिया सजती थी........

अधिकार जरा सा मिलते ही,
वह अंतरिक्ष तक हो आयी...
जल में,थल में,रण कौशल में
सक्षमता अपनी  दिखलायी.......

आज यहीं विराम लेते हैं। 
आपकी स्नेहमयी प्रतिक्रियाओं और सारगर्भित सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। 
फिर मिलेंगे। 


रवीन्द्र सिंह यादव 
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