जय मां हाटेशवरी....
काव्य क्षेत्र के शेरोमणी व हिंदी साहित्य के
सबसे बड़े रत्न

राष्ट्रीय कवि मैथली शरण गुप्त
का निधन आज के दिन ही
यानी 12 दिसंबर को हुआ था....
सर्वप्रथम इन्हे कोटी-कोटी नमन....
जीवन की ही हो जय
मृषा मृत्यु का भय है
जीवन की ही जय है .
जीव की जड़ जमा रहा है
नित नव वैभव कमा रहा है
यह आत्मा अक्षय है
जीवन की ही जय है.
नया जन्म ही जग पाता है
मरण मूढ़-सा रह जाता है
एक बीज सौ उपजाता है
सृष्टा बड़ा सदय है
जीवन की ही जय है.
जीवन पर सौ बार मरूँ मैं
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं
तो फिर महाप्रलय है
जीवन की ही जय है.

छोड़ दी थक-हारकरआधा अधूरा..बोली अपने आप से...चलूँ दीदी के पास...आज दिन तीसरा हैमातारानी का...कर आऊँ दर्शन दीदी के.....वो भी तो माँ है मेरी..----आदरणीय दिव्या अग्रवालकविता-मंच पर
राजा हो रंक पेट तो सताएगाउनको भी तो चूल्हे से आग लेने दोनज़दीक वो कभी नज़र न आएंगेसोए हुए हैं शेर जाग लेने दोहम आस्तीन में छुपा के रख लेंगेइस शहर में हमको भी नाग लेने दोया जुगनुओं को छोड़ दो यहाँ कुछ पलया फिर हमें भी इक चराग़ लेने दो-----आदरणीय दिगंबर नासवास्वप्न मेरे...........पर...
बताओ ,बेटी-बहन किधर सेगर्म माँस नहीं होतीं ?फिर तो अहल्या हो ,उपरंभा हो ,निर्भया या जायरा हो,क्या फ़र्क पड़ता है ?भयभीत हो दबा ले भलेटेढी दुम ,----आदरणीय प्रतिभा सक्सेनाशिप्रा की लहरें पर...

कोई साथ नहीं देता बुरे समय मेंजब भी नज़र भर देखती हैयही दुविधा रहती हैकहीं राह न भूल जाए !पर ऐसा नहीं होताभ्रम मात्र होता है !---आदरणीय आशा सक्सेनाआकांक्षा पर....
खुश भी होती हैतस्वीरेंंगमगीन भी होती हैसह लेती हैसब, सभी कुछआदरणीय रौशन जसवाल विक्षिप्तआधारशिला पर....
इन बच्चों की मौतें; मौतें न होकर मिट्टी के खिलौने टूट रहे हो...अरे भई, खिलौने भी टुटते हैं तो दिल में दर्द होता हैं...ये तो जीते-जागते बच्चे थे! किसी माँ-बाप के जिगर के टुकड़े...कितनी नाजों से पाला होगा उनके माँ-बाप ने उन्हें...उनकी मौत पर कितने खून के आँसू रोएं होंगे वे...!! सचमुच कभी-कभी लगता हैं कि कितने संवेदनाहीन हो गए है हम। यदि ये घटना हमारे अपने बच्चे के साथ होती या किसी बड़े नेता के बच्चे के साथ होती तब शायद हमारे या बड़े-बड़े नेताओं के कान पर जू रेंगती! अभी तो सभी के लिए इन बच्चों की मौतें सिर्फ़ आंकड़े बन कर रह गई हैं। यहां इतने मरे...और वहां उतने मरे...बस! कुछ समय पहले जापान के एक ख़बर की हमारे मीडिया में बहुतचर्चा थी। जिसके अनुसार जापान में सिर्फ़ एक बच्ची स्कूल जा सके इसलिए स्पेशल एक ट्रेन उसके गांव तक आती थी। सिर्फ़ एक बच्ची के लिए ट्रेन! इतना महत्व दिया जाताहैं जापान में देश की एक आम बच्ची को और हमारे यहां सैकडों बच्चों के जान की कोई किंमत नहीं हैं। यहां पर सभी लोग सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने मेंव्यस्त हैं।----आदरणीय ज्योति देहलीवालआपकी सहेली पर...
जाग गयी है’, ‘बड़ी बाई साहेब’ और ‘डेरा उखड़ने से पहले’ कहानियों में हम भी स्त्री की हृदय की विषम वीथियों में जैसे वन्दना जी के हमराह बन जाते हैं ! ‘हवा उद्दंडहै’, ‘बातों वाली गली’ और ‘आस पास बिखरे लोग’ वास्तव में इतनी यथार्थवादी कहानियाँ हैं कि ज़रा इधर उधर गर्दन घुमा कर देख लेने भर से ही इन कहानियों के पात्र सशरीर हमारे सामने आ खड़े होते हैं !‘बातों वाली गली’ कहानी संग्रह की हर कहानी हमें एक नए अनुभव से तो परिचित कराती ही है हमारी ज्ञानेन्द्रियों को नए स्वाद का रसास्वादन भी कराती है !पुस्तक नि:संदेह रूप से संग्रहणीय है ! इतने सुन्दर संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई ! वे इसी तरह स्तरीय लेखन में निरत रहें और हमें इसी प्रकार अनमोलअद्वितीय कहानियाँ पढ़ने को मिलती रहें यही हमारी शुभकामना है ! आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी वन्दना जी ! हार्दिक अभिनन्दन !साधना वैदसुधिनामा पर...
इस तरह...........एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले सोमवारीय विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं कालिंक हमें आगामी शनिवार की शाम तक प्रेषित करें। आप हम तक सूचना पहुँचाने के लिए ब्लॉग सम्पर्क फार्म का उपयोग करे...
तो आइये एक कारवां बनायें।
एक मंच,सशक्त मंच !
सादरकुलदीप ठाकुर
“जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं.
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं.”
धन्यवाद।



