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सोमवार, 4 दिसंबर 2017

871...ब्लॉग जगत के सशक्त 'हस्ताक्षर'

कहते हैं इच्छायें उड़ती हैं परन्तु किस दिशा में ? 
व्यक्तिगत इच्छाओं का मूल्य तो है, 
सही दिशा भी हो यह आवश्यक नहीं ! 
कई इच्छायें यदि एक साथ चलें ज़ाहिर है 
सकारात्मक सोच,नई दिशा और दिशाओं के सही मायने 
हमें अवश्य नज़र आते हैं। 
यही प्रयास है हमारे विशेषांक के इस कड़ी का 

सादर अभिवादन 

आज ब्लॉग जगत के कुछ 'विद्वान' रचनाकारों को 
आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। 
जो ब्लॉग जगत के 
सशक्त 'हस्ताक्षर' हैं।  


कारवां ख़त्म नहीं होता यहाँ 
मंज़िले और भी हैं। 
सादर 

आदरणीय 

  • सतीष सक्सेना ( ब्लॉगिंग की शुरुआत 2008 से )
  • एम.रंगराज अयंगर ( २०११ )
  • ज्योति खरे  ( २०१२ )
  • राजेश कुमार राय ( २०१५ )
  • दिगंबर नासवा (२००६ )
  • विश्वमोहन (२०१४ )
  • रविंद्र सिंह यादव ( २०१६ )
  • ओंकार केडिया ( २०११ )
  • डॉ. सुशील कुमार जोशी ( २००९ )
  • पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ( २०१५ )
  • राकेश कुमार श्रीवास्तव 'राही' ( २०११ ) 

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! 
 बचपन यहाँ बिताकर अब तुम
अपने नए निवास चली हो !
आज पिता की गोद छोड़ कर
करने नव निर्माण चली हो !


 रामचंद्र जी मार चुके हैं,
त्रेतायुग में रावण को,


  हर धड़कते दिल में जिन्दा 
    दामिनी 


 हर तरह की कसक भूल जाओगे तुम
मैक़दे की कसम डूब जाना यहाँ।


 दिया जलेगा या बाती या तेल जलेगा 
या मेरा दिल कोने मैं चुपचाप जलेगा 


 मरघट में मची हाहाकार,
पथरायी मासूम आँखे ,

 अभी-अभी सुनी है मैंने 
तुम्हारे गेहुएं पांवों में बंधी 
पायल की आखिरी खनक.

 शोर  सुनकर  कौतूहलवश
बच्चे, बूढ़े, अधेड़, जवान  सभी
देखने  आये  लपककर


 दिये का चलन खत्म हो चला समझो
बल्ब को सूरज बना रहा आदमी।


समय निरंकुश क्या बंध पाएगा,
अनुबंधों की परिधियां तोड़ता,


 तपिश दे रहा है , सूरज अभी भी ,
तू आ जाए तो , चैन आ जाए |


हमारे 'पाठकों की पसंद' विशेषांक

आज के गणमान्य पाठक हैं 
आदरणीया /आदरणीय 

सुशील कुमार जोशी जी
रेणु बाला जी 
विश्वमोहन जी 
पुरुषोत्तम जी 
सुधा सिंह जी
शकुंतला शाकु जी 

( प्राप्त रचनायें ) 

आदरणीय, शम्भू राणा की कलम से  

पाठक : सुशील कुमार जोशी जी

आदरणीया 'पूनम मोहन' 
पाठक : विश्वमोहन जी 

पाठक : पुरुषोत्तम सिन्हा जी 

आदरणीय 'महातम मिश्रा' 
पाठक : रेणु बाला जी 

पाठक : सुधा सिंह जी 

आदरणीया  "कैलाश निहारिका"         
पाठक : सुशील कुमार जोशी जी 

बेहुनर हाथ किसी काबिल बना दूँ  तो चलूँ
आस की  डोर हथेली में  थमा दूँ तो चलूँ 

पाठक : शकुंतला शाकु जी 



आप सभी गणमान्य पाठकों के अमूल्य योगदान से 
हमारा 'पांच लिंकों का आनंद' परिवार कृतार्थ हुआ। 
आशा है यह सहयोग व स्नेह भविष्य में भी जारी रहेगा ! 
शुभकामनाओं सहित 


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