सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
दशहरा दीवाली छठ बताते हैं
बुराई से लड़ने की ताकत
और जीत दिलाती है
हमारी संस्कृति और हमारी
आस्था
झौंक देंगे पूरे शहर को आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।
धर्म के नाम पर धोखा
लाचारों को गुमराह कर,
अपना साम्राज्य बना रहे हैं,
भक्ति के नाम पर ,
विवेक मिटा सही गलत की समझ मिटा रहे,
यह कैसा धंधा भगवान के नाम पर,
मासूम जिंदगियां लगा रहे दांव पर,
अनास्था के दौर में आस्था
यदि जडता परम्परा है तो परिवर्तन आधुनिकता है ।
परिवर्तन ही बनी बनाई धारणाओं का खंडन करके प्रेम के पक्ष मे माहौल तैयार करता है ।
जी हां प्रेम युद्ध का प्रतिपक्ष है ।
इस कृति मे महज विरोध और विश्लेषण भर नही है
प्रेम का सकारात्मक अनुचिन्तन है
प्रयोगवादी कविता
मैं आस्था हूं
तो मैं निरंतर उठते रहने की शक्ति हूं
... ... ...
जो मेरा कर्म है,उसमें मुझे संशय का नाम नहीं
वह मेरी अपनी सांस-सा पहचाना है
फूस के छप्पर पर
समझ से परे
जिंदगी के कई मोड़
जी चुके कई पल, कई लम्हें, कई कथाएं
लताओं के लिए अथाह सागर
पूरा जीवन सिमटता नजर आता
><><
फिर मिलेंगे
बुराई से लड़ने की ताकत
और जीत दिलाती है
हमारी संस्कृति और हमारी
आस्था
झौंक देंगे पूरे शहर को आग में
रहबरों का ही आसरा है उनको
इसलिये बड़ा हुआ है हौंसला
कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।
धर्म के नाम पर धोखा
लाचारों को गुमराह कर,
अपना साम्राज्य बना रहे हैं,
भक्ति के नाम पर ,
विवेक मिटा सही गलत की समझ मिटा रहे,
यह कैसा धंधा भगवान के नाम पर,
मासूम जिंदगियां लगा रहे दांव पर,
अनास्था के दौर में आस्था
यदि जडता परम्परा है तो परिवर्तन आधुनिकता है ।
परिवर्तन ही बनी बनाई धारणाओं का खंडन करके प्रेम के पक्ष मे माहौल तैयार करता है ।
जी हां प्रेम युद्ध का प्रतिपक्ष है ।
इस कृति मे महज विरोध और विश्लेषण भर नही है
प्रेम का सकारात्मक अनुचिन्तन है
प्रयोगवादी कविता
मैं आस्था हूं
तो मैं निरंतर उठते रहने की शक्ति हूं
... ... ...
जो मेरा कर्म है,उसमें मुझे संशय का नाम नहीं
वह मेरी अपनी सांस-सा पहचाना है
फूस के छप्पर पर
समझ से परे
जिंदगी के कई मोड़
जी चुके कई पल, कई लम्हें, कई कथाएं
लताओं के लिए अथाह सागर
पूरा जीवन सिमटता नजर आता
><><
फिर मिलेंगे