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रविवार, 24 सितंबर 2017

800....बस मतलब की बातें समझने वालों को कैसे समझाई जायें बेमतलब की बातें


सादर अभिवादन
प्रसन्नता अपार....
पर व्यक्त करूँ तो करूँ कैसे
शब्दों का टोटा हो गया अचानक....
आज की प्रस्तुति में हम
सभी चर्चाकारों की पसंद की दो रचनाएँ


भाई रवीन्द्र जी की पसंद..
जी चाहता है,
काँच के किसी जादुई टुकड़े से
हर एक के हथेलियों में
खुरच खुरच कर खींच दूँ
खुशियों भरी तकदीर की रेखा।

अबला की गिनती में आना, 
अब मुझको स्वीकार नहीं
शांत, विनम्र, मधुर, ममतामय 
हूँ लेकिन लाचार नहीं
हर दुर्योधन, दुःशासन से, 
लड़ने की जिद मैं करती हूँ !

..कुलदीप भाई की पसंद..


'वृद्ध-आश्रम' होने चाहिए या नहीं?.. प्रीति अज्ञात
यहाँ न सपने हैं न ख्वाहिशें। उम्मीदों की टूटन, रिश्तों की सघन गर्मी,
मन की उष्णता, ह्रदय की घुटन और इस सबको भुलाने की नाक़ाम कोशिशों में लगे तमाम अनुभवों की ठिठुरन है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाकर और कर्तव्यों के आगे स्व की तिलांजलि देने के बाद जो शेष है वही इनका जीवन है. अपनों का दूर जाना
जितना आसान  है


"हाँ हम शर्मिंदा हैं"...प्रीती राजपूत शर्मा
ना जाने कब ये शर्मिंदगी दूर होगी।
न जाने कब बेटी के जन्म पे फिर से दीवाली होगी।
हम सच में शर्मिंदा हैं की हम 125 करोड़ के इस युवा प्रधान देश में भी
सुरक्षा के नाम पर हर रोज बलत्कार के शिकार हो रहे है ।
हम शर्मिंदा हैं क्योंकि ये सब देख कर भी हम जिन्दा हैं ।

विभा दीदी की पसंदीदा रचनाएँ

मधुर मधुर हो अपना जीवन....अशोक व्यास
पीढ़ी दर पीढ़ी
अनुस्यूत
एक भाव
एक सात्विक सातत्य
सहेजता
सम्बन्ध समग्रता से
 खिल  जाता सौंदर्य शाश्वत का


नीड़ का निर्माण फिर-फिर.......राजीव के. सक्सेना
वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया  सहसा अंधेरा
धूल धूसर बादलों न
भूमि को एस भांति घेरा
रात सा दिन हो गया फिर

पम्मी सिंह जी की पसंद
ग़ज़ल..पूनम मटिया
हैफ़ ! कितना बदल गई हूँ मैं
शम्अ जैसे पिघल गई हूँ मैं

क्या यही मैं थी, क्या वही हूँ मैं
किसके पैकर में ढल गई हूँ मैं


कैसी चले रहे हो तुम चाल साहब....राज कानपुरी
कैसी चले रहे हो तुम चाल साहब 
कर रहे हो इंसां को हलाल साहब 

चूस कर के खून इन गरीबों का 
हो रहे हो और मालामाल साहब

हमारा ८०० वां अंक, शुक्र है यहाँ रचनायें शामिल करने के लिए रचनाकारों का किसी नामी -ग्रामी रचनाकारों का शागिर्द अथवा पिछलग्गू होना आवश्यक नहीं। जो सत्य है अजेय है ,'सार्वभौमिक' एवं सत्य कभी छुपता नहीं ,अपने तेज को चारों ओर बिखेरता है। इसी सत्य को हम साकार करने की चेष्टा इस ब्लॉग "पाँच लिंकों का आनंद'' परिवार की ओर से कर रहे हैं, आप सब का सहयोग अपेक्षित है। इसी क्रम में इस विशेषांक पर मेरी पसंद की दो रचनायें हमारे युवाकवि आदरणीय "पुरुषोत्तम सिन्हा"  एवं 
आदरणीय राकेशश्रीवास्तव"राही" द्वारा "एकलव्य" 



मुखर हुई वाणी उस बिंब की,
स्पष्ट हो रही अब आकृति उसकी,
घटा मोह की फिर से घिर आई,
मन की वृक्ष पर लिपटी अमरलता सी।




 साष्टांग प्रणाम इन बाबाओं के भक्तों को भी, जो इन बाबाओं के विरुद्ध साक्ष्य होने के बाद भी अपनी भक्ति में कोई कमी नहीं रखी। इसके साथ ही मैं वैधानिक ढंग से क्षमा चाहता हूँ उन बाहुबली भक्तों से जो महाबली बन कर भारत के सम्प्रभुता को चुनौती देते आए है तो 
मैं किस खेत की मूली हूँ। 

अब हम दोनों की पसंदीदा रचनाओं की बारी..


मुझ तक पहुँच जाओगे...!!!...सुषमा वर्मा
मैं आज किसी सुकून की तलाश में,
उन जगहों पर जा कर,
पहरों बिता आती हूँ,
जिस जगह तुम घंटो बैठा करते थे..
तुम्हारी खुशबू हर तरफ महसूस करती हूं,


गालों का गुलाल...आनन्द द्विवेदी
एक दिन जब 
मुस्कराता हुआ ईश्वर 
मेरी रूह पर वैधानिक चेतावनी सा 
गोद रहा था ..प्रेम 
मैं उसके हाथ से फिसल कर गिरा तुम्हारी मुंडेर पर 


दीपा....एम. रंगराज अय्यंगर
उसने दीपा की हालत देखी थी, तो कुछ कह नहीं पाया था. 
जब पति के साथ दीपा उतरने लगी गाड़ी से - 
तब लड़के ने सिर्फ इतना कहा - दीदी - "आई एम सॉरी दीदी." 
दीपा अभी अभी शांत हो पायी थी. लड़के की बात सुनकर 
उसकी आँखों की कोरें फिर भीग गई. दीपा ने ममता भरा 
हाथ उसके सिर पर फेरा और आगे बढ़ गई. 

और  अब ये हमारी पसंद की अंतिम रचना..
मेरी चचेरी बहन दिव्या...लगभग पूरे पितृ-पक्ष में हमारे घर पर ही थी

वो बिगड़ गई थी..गरम कहानियाँ लिखती थी..हमारी समझाईश व पितरों के आशिर्वाद से अब वह ठीक हो गई है.. किसी संत ने ठीक ही कहा है
निंदक नियरे राखिए,आँगन कुटी छवाए
साबुन पानी के बिना मन निर्मल करे सुहाए
कूड़ा 
'' कचरा सबसे ज्यादा पढ़ी गई.. 
उसी की लिखी एक कविता..


कूड़ा 'औ' कचरा...दिव्या अग्रवाल
लिखती थी मैं 
कूड़ा 'औ' कचरा 
आती थी बदबू 
दिखाई पड़ती थी 
दिव्या के कूड़ेदान पर,

इस कविता को श्रीमति मीना शर्मा जी ने समझा...
उनकी प्रतिक्रिया...

Meena Sharma19 September 2017 at 22:59
हैरान हूँ मैं तो दिव्याजी, ये देखकर कि आपने इतनी निर्भीकता, इतने बडप्पन से अपनी गलतियों को न केवल मान लिया है, बल्कि सभी के सामने मान लिया है !!!

दिव्याजी,लेखक समाज में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपने लेखन पर स्वयं ऐसी टिप्पणी कर सकें जैसी आपने की है । ईश्वर आपको सुंदर लेखन के उपहार से नवाजे,इसी शुभकामना और बहुत सारे स्नेह के साथ....



‘उलूक’  के पन्ने से साभार..

तो आईये
‘आठ सौवीं’ 
'पाँच लिंको
की हलचल’ 
के लिये पकाते हैं 
आसपास हो रही 
हलचल को लेकर 
दिमाग के गोबर 
के कुछ कंडे 
यूँ ही सोच 
में लाकर 
रंग में सरोबार 
कन्हैया भक्त 
बरसाने के 
डंडे बरसाते 

बस....
मैं ये समझती हूँ.... इससे ज़ियादा
हमारे पाठक नहीं झेल सकते

इति..आठ सौवां अंक
यशोदा ..















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