सादर नमस्कार..
नव रात्रि का दूसरा दिन
माँ ब्रम्हचारिणी को शत शत नमन
माँ अबलाओं व निरीह कन्याओं को
अपनी शक्ति प्रदान कीजिए
मातेश्वरी को नमन करते हुए
चलें आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर...
माँ मेरा उद्धार करो!...विश्वमोहन
मञ्जूषा ममता की, माँ, अमृत छाया,
निमिष निमिष नित प्राण रक्त माँ पाया।
क्रोड़ करुणा कर कण कण जीवन सिंचित,
दृग कोशों से न ओझल हो तू किंचित।
तुम चुप थी उस दिन....पम्मी सिंह
जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की,
तमाम गुजरे, पलों की फ़साने दफ़्न कर..
जिंदगी की राहों से जो गुज़री हो
जो ज़मीन न तलाश कर सकी ,
मसाइलों की क्या बात करें...
ये उम्र के हर दौर से गुज़रती है.
दुआ.....अमित जैन "मौलिक"
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।
शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।
टूटकर फूल शाखों से....श्वेता सिन्हा
अंजुरी में कितना जमा हो जिंदगी
बूँद बूँद पल हर पल फिसल रहे है
ख्वाहिशो की भीड़ से परेशान दिल
और हसरतें आपस में लड़ रहे है
मैं और मेरी सौतन...सुधा सिंह
नव रात्रि का दूसरा दिन
माँ ब्रम्हचारिणी को शत शत नमन
माँ अबलाओं व निरीह कन्याओं को
अपनी शक्ति प्रदान कीजिए
मातेश्वरी को नमन करते हुए
चलें आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर...
माँ मेरा उद्धार करो!...विश्वमोहन
मञ्जूषा ममता की, माँ, अमृत छाया,
निमिष निमिष नित प्राण रक्त माँ पाया।
क्रोड़ करुणा कर कण कण जीवन सिंचित,
दृग कोशों से न ओझल हो तू किंचित।
तुम चुप थी उस दिन....पम्मी सिंह
जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की,
तमाम गुजरे, पलों की फ़साने दफ़्न कर..
जिंदगी की राहों से जो गुज़री हो
जो ज़मीन न तलाश कर सकी ,
मसाइलों की क्या बात करें...
ये उम्र के हर दौर से गुज़रती है.
दुआ.....अमित जैन "मौलिक"
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।
शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।
टूटकर फूल शाखों से....श्वेता सिन्हा
अंजुरी में कितना जमा हो जिंदगी
बूँद बूँद पल हर पल फिसल रहे है
ख्वाहिशो की भीड़ से परेशान दिल
और हसरतें आपस में लड़ रहे है
मैं और मेरी सौतन...सुधा सिंह
डरती हूँ अपनी सौतन से
उसकी चलाकियों के आगे मैं मजबूर हूँ
कहती है वह बड़े प्यार से - "तुम जननी बनो.
गर्भ धारण करो.
अपने जेहन में एक सुंदर से बालक की तस्वीर गढ़ो.
उसका पोषण करो.
आनेवाले नौ माह की तकलीफें सहो.
हिम्मत तो की होती बुलाने की....दिलबाग सिंह विर्क
जिन्हें घर भरने से फ़ुर्सत नहीं
वो क्या करेंगे फ़िक्र ज़माने की।
हम न आते तो गिला भी करते
हिम्मत तो की होती बुलाने की।
हया की वो रात!...ये मोहब्बतें
एक ही बिस्तर पर
खिंच गयी थी तकिये की दीवार:
इस तरफ़ उसके अरमान
मुहाफ़िज़ बने बैठे थे
और दूसरी तरफ़ रातों की
रंगीनियां थी बेहिसाब,
ये लम्हा ये आरज़ू वो बरस दो बरस.....पुष्पेन्द्र द्विवेदी
कमाल की शायरी में जुमले कमाल के ,
ये आरज़ू ए आशिक़ी है या मौसम ए सुखन ।
मोहब्बतों की सारी उम्मीदें गर मुझी में सिमटी हों ,
मैं कैसे किसी गैर की आरज़ू करता ।
आज्ञा दें दिग्विजय को
फिर मुलाकात होगी..
सड़क में सर्कस देखिए
मात्र एक मिनट चार सेकेण्ड







