सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
पितृपक्ष को हम क्यूँ साधने बनाते और करते हैं अपनों का
उन दिनों हरियाणा में अंग्रेजी भाषा स्कूलों में छठी कक्षा से पढाई जाती थी --
एक ये भी कारण था कि बच्चे बोर्ड की क्लास में पहुँचकर भी अंग्रेजी में प्रायः बहुत अच्छे नहीं होते थे |
श्री मति महाजन को बखूबी पता था कि हमारी अंग्रेजी भाषा की नींव अच्छी नहीं है
अतः उन्होंने भाषा के समस्त नियम समझाकर हमें भाषा में पारंगत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी |
वे अक्सर रविवार या किसी अन्य छुट्टी के दिन भी हमें अंग्रेजी पढ़ाने हमारे स्कूल पहुँच जाया करती !
यहाँ तक कि दिसंबर महीने में जब सर्दकालीन अवकाश घोषित हुए
तो उन्होंने हमारी कक्षा में आकर कहा कि वे अवकाश के दौरान भी हमें पढ़ने आया करेंगी,
क्योंकि वे हमारे सलेबस की दुहराई करवाना चाहती हैं |
इस कविता संग्रह का आवरण आज के हिंदी के समर्थ कथाकार और
चित्रकार राजकमल ने बनाया था, तब वह अपना नाम
'राजकमल भारती' लिखा करते थे।
इस कविता संग्रह में उनका भी नाम गया।
हम अक्सर काफी जगहों में जाते हैं , और वहां के भिन्न-भिन्न अनुभव साथ लाते हैं ,
कुछ यादें अच्छी होती है कुछ बुरी, कुछ प्रेरणादायी और कुछ अनोखी...
पिछले रोज मैं अपने एक रिस्तेदार के यहाँ शादी के अवसर पर गया था
वहाँ उस परिवार को करीब से अनुभाव करने का मौका प्राप्त हुआ
और पता चला की शादी एक बड़ी जिम्मेदारी होती है हम सब के लिए ...
उसके इंगित दिशा की ओर मैंने देखा तो होटल से
कुछ ही दूरी पर सड़क किनारे एक टूटा हुआ झोपड़ा दिखाई पड़ा।
झोपड़े के आस - पास कनेर के पुष्प की क्यारियाँ थी।
इतना सब देखने और जानने के बाद
ना कहने का कोई कारण नहीं था।
गुजर गए अपनों की स्मृतियों को याद करके सोचता हूँ कितना सूनापन है उनके बिना ।
घर की उनकी संजोई हर चीज को जब छूता हूँ तब
उनके जिवंतता का अहसास होने लगता डबडबाई
आँखों /भरे मन से एलबम के पन्ने उलटता तब
जीवन में उनके संग होने का आभास होता है
उनकी बात निकलने पर अच्छाईयाँ मानस पटल पर
स्मृतियों में उर्जा भरने लगती है कहते है स्मृतियाँ अमर है
लेकिन यादों की उर्जा पर इसलिए कहा गया है
कि करोगें याद तो हर बात याद आएगी ।
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फिर मिलेंगे