सादर अभिवादन!
आजकल देश की हवा को कई मुद्दे लगातार गर्म बनाये हुए हैं।
बाढ़ का तांडव ,सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौतें, लम्पट बाबाओं के कारनामे, नोटबदली की सफलता-असफलता , 2022 के लिए सिद्धि-संकल्प ,पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें ,
रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी संकट ,
डोकलाम में मिली सफलता के बाद ब्रिक्स में भारत का रुतबा।
इन सबके बीच जलता हुआ मुद्दा है
पत्रकार-लेखिका गौरी लंकेश की निर्मम हत्या।
असहमति और आलोचना अब डरकर बैठ जाए क्या ? सृजन से जुड़े हम सभी एक आपसी रज़ामंदी से ही देश में ख़ुशनुमा माहौल का निर्माण करते हैं साथ ही विभिन्न मुद्दों पर अलग राय रखते हुए सद्भाव से एक ठहराव में गुंथे हुए हैं जिसे देश कहते हैं। यह देश हम सबका है किसी एक की बपौती नहीं है। यह देश संविधान से चलता है किसी संकुचित सोच से नहीं। किसी धार्मिक विश्वास से नहीं।
धर्मान्धता और कट्टरता जब सर चढ़कर बोलती है तब अलगाव और नफ़रत का भाव खाद-पानी ले रहा होता है। आज रंग ,भाषा ,त्यौहार,खानपान ,संगीत ,साहित्य ,सिनेमा ,कलाकार ,पत्रकार ,बुद्धिजीवी ,लेखक ,चिंतक आदि सब बंटे हुए नज़र आ रहे हैं। दरअसल यह मानसिक संकीर्णता का परिचायक है जो हमें दायरों में सिकोड़ती जा रही है।
चलिए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलते हैं-
गौरी लंकेश जी को श्रद्धांजलि अर्पित करती
आदरणीय गोपेश जैसवाल जी की शब्दांजलि -
विनम्र श्रद्धांजलि गौरी लंकेश …….गोपेश जैसवाल
इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी----राजेश कुमार राय
वादा करना कायम रहना इतना तो आसान नहीं था
तुम एक जनम में ऊब गये मुझे सातों जनम निभाना है
बस इक जरा सी हरकत से ही प्यार तुम्हारा टूट गया
अब वक्त कहाँ है हाथों में बस जीवन भर पछताना है
समाज की दोहरी सोच पर प्रहार करती
सोनाली भाटिया जी की एक प्रेरक लघुकथा -
दोहरापन (कहानी )……… सोनाली भाटिया
और फिर माँ ने कितना समझाया था उसे की बेटा अभी तू छोटी है सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे | और उसने प्रशांत को पसंद करने की बात माँ को बतानी चाही तो माँ ने फिर समझाया की तू इस काबिल नहीं है अभी की अपनी ज़िंदगी के इतने अहम फैसले ले सके |
पर आज वही माँ उसकी शादी करा रही है | तो क्या आज उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी बेटी अभी छोटी है और अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले लेने लायक नहीं है या उसकी पढाई अभी ज्यादा जरुरी है |
व्यवस्था पर तीखा प्रहार करती विक्रम प्रताप सिंह सचान जी की विचारोत्तेजक रचना-
गौरी लंकेश जी को श्रद्धांजलि अर्पित करती
आदरणीय गोपेश जैसवाल जी की शब्दांजलि -
विनम्र श्रद्धांजलि गौरी लंकेश …….गोपेश जैसवाल
ज़ुल्म की हर इंतिहा, इक हौसला बन जाएगी,
और खूंरेज़ी मुझे, मंज़िल तलक पहुंचाएगी,छलनी-छलनी कर दिया सीना मेरा तो क्या हुआ?ये शहादत, कौम को, जीना सिखाती जाएगी.
जीवन के तमाम बिषयों को ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति देती आदरणीय राजेश कुमार राय जी की लाजवाब रचना -
वादा करना कायम रहना इतना तो आसान नहीं था
तुम एक जनम में ऊब गये मुझे सातों जनम निभाना है
बस इक जरा सी हरकत से ही प्यार तुम्हारा टूट गया
अब वक्त कहाँ है हाथों में बस जीवन भर पछताना है
समाज की दोहरी सोच पर प्रहार करती
सोनाली भाटिया जी की एक प्रेरक लघुकथा -
दोहरापन (कहानी )……… सोनाली भाटिया
और फिर माँ ने कितना समझाया था उसे की बेटा अभी तू छोटी है सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे | और उसने प्रशांत को पसंद करने की बात माँ को बतानी चाही तो माँ ने फिर समझाया की तू इस काबिल नहीं है अभी की अपनी ज़िंदगी के इतने अहम फैसले ले सके |
पर आज वही माँ उसकी शादी करा रही है | तो क्या आज उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी बेटी अभी छोटी है और अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले लेने लायक नहीं है या उसकी पढाई अभी ज्यादा जरुरी है |
व्यवस्था पर तीखा प्रहार करती विक्रम प्रताप सिंह सचान जी की विचारोत्तेजक रचना-
बुनियादी जरूरतों के सवाल सभी निपटा दिये।
कुछ तो पानी बचायें रखते अपनी आँख में
मौत पर जो रोने गये उनपे भी पहरे बिठा दिये।
श्वेता सिन्हा जी की एक मर्मस्पर्शी रचना -
इंतज़ार…....श्वेता सिन्हा
भीगती सारी रात
आदरणीय( बहन जी) यशोदा अग्रवाल जी द्वारा
"मेरी धरोहर" पर प्रस्तुत
डॉ. निधि अग्रवाल जी की एक गंभीर रचना-
इंतज़ार…....श्वेता सिन्हा
भीगती सारी रात
चाँदनी की बारिश में
जुगनुओं से खेलती लुका छिपी
काँच की बोतलों में
भरकर ऊँघते चाँद की खुशबू
थक गयी हटाकर
बादलों के परदें
एक झलक भोर के
इंतज़ार में,
स्त्री जीवन से जुड़े मनोभावों को अभिव्यक्त करती जुगनुओं से खेलती लुका छिपी
काँच की बोतलों में
भरकर ऊँघते चाँद की खुशबू
थक गयी हटाकर
बादलों के परदें
एक झलक भोर के
इंतज़ार में,
आदरणीय( बहन जी) यशोदा अग्रवाल जी द्वारा
"मेरी धरोहर" पर प्रस्तुत
डॉ. निधि अग्रवाल जी की एक गंभीर रचना-
प्रेम-समर्पण...........डॉ. निधि अग्रवाल
स्त्री तो होती है जड़ों के मानिंद
अपनी मिट्टी से जुड़ी रहती हैं,
टूटती नहीं ये अपमानों से
प्यार के बोल सुन सब्र खोती हैं,
ओढ़ लेती हैं धानी चुनर मुस्कानों की
और फिर किसी कोने में छुप रो लेती हैं.
धन्यवाद
आपके सारगर्भित सुझावों की प्रतीक्षा में ।
अब आज्ञा दें।
फिर मिलेंगे।