विवादों में आना मेरी प्रसन्नता नहीं परन्तु बने रहना
दुःख एवं घोर कुण्ठा का परिचायक अवश्य है।
दुःख एवं घोर कुण्ठा का परिचायक अवश्य है।
कल 'शिक्षक दिवस' अपार हर्ष का विषय किन्तु भारत की प्रथम ''महिला शिक्षिका'' को विस्मृत करना अत्यंत शर्मनाक ! हो सकता है कुछ मुझे भला-बुरा भी कहें शिरोधार्य ,आपकी आलोचनाओं का परन्तु आलोचक वही होगा जिसने अपने भारत के इतिहास को पढ़ा न हो !
चली आ रही वर्षों की परम्परा का घोर पूजक हो ,स्वयं को बदलने की इच्छा न रखता हो।
आश्चर्य तो होगा और होना भी चाहिए ,आप 'शिक्षक दिवस' प्रत्येक वर्ष बड़े ही धूम -धाम से मनाते हैं और इस पवित्र अवसर पर 'शिक्षिका दिवस' की बात करना मूर्खता भरी हरक़त प्रतीत होती है परन्तु कभी -कभी मूर्खता में भी जीवन का यथार्थ छुपा होता है।
एक अविस्मरणीय नाम परन्तु अधिकांश जनों से अनिभिज्ञ
देश की पहली महिला शिक्षिका
देश के पहले कन्या विद्यालय की संस्थापिका
स्त्रियों की सामाजिक दशा सुधारने में सर्वप्रथम महिला पहल
एक सशक्त आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत "कवियत्री"
मुझे शिक्षक दिवस से कोई परहेज़ नहीं किन्तु दुःख इस बात का है आजादी के पहले जिन्होंने समाज सुधार के प्रयास किए क्या..
उन्हें याद करने का कोई औचित्य नहीं ?
उन्हें याद करने का कोई औचित्य नहीं ?
वे नाम क्या हाशिये पर रखना उचित है ?
क्या हमें नई सोच व विचार पर आधारित तर्कसंगत बातों
पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं ?
पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं ?
यदि आपके विचार मुझसे सहमत हैं तो 'शिक्षिका दिवस' क्यों नहीं ?
ये आवाज़ धीमी क्यों पड़ रही है ?
(3 जनवरी 1831 – 10 मार्च 1897)
आइये अपने विचारों को एक नया आयाम दें ,
भूले -बिसरे यादों को एक नया नाम दें !
सादर अभिवादन
''बेटियाँ''..... ....... डा."कुँवर बेचैन"
आज के सुखद साहित्य यात्रा का प्रारम्भ साहित्य के 'सशक्त हस्ताक्षर' आदरणीय डा."कुँवर बेचैन" साहब की एक कृति के साथ
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं
''डरती हूँ''..आदरणीया "वंदना शर्मा"
तुम्हें याद ना करना,
यह मेरे बस की बात नहीं,
पर तुम्हें कोई ओर याद करे,
इस बात से डरती हूँ।
''सड़क''..आदरणीय ''अरुण रॉय''
सड़कें
धरती को नहीं छोड़ती
जो धरती को छोड़ते हैं
औंधे मुँह गिरते है
किसी न किसी मोड़ पर
फैक्ट्रियाँ सारी बंद करवाएं,
प्यार भावना को हम अपनाएं |
एक दूजे के तरफ ले जाएं,
''बिखराव''...आदरणीया "आशा सक्सेना"
जड़ें गहराई तक जातीं
डाली डाली पल्लवित होती
जब किसीका सामना होता
खुल कर भाव बाहर आता
एक से दो , दो से चार
आपस में जुड़ जाते
"शब्द" आदरणीया "मीना शर्मा"
अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!
''लम्पट बाबा'' --आदरणीया "रेणु बाला"
आत्मविश्वास मनुष्य में समाहित अमूल्य रत्न मणि है।
आत्मविश्वास एक ऐसी पूंजी है
जो मनुष्य की सबसे बड़ी धरोहर है।
ज़द्दोज़हद ...आदरणीया -''सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना''
उफ्फ बरसाती रात
कहीं जीवन हेतु संघर्ष अविराम
नदियों का राक्षसी उफान
और डूबा हुआ सारा घर-बार
सड़क पर सिमटाए अपना
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले ....... आदरणीय जगदम्बा प्रसाद "हितैषी"
जुदा मत हो मेरे पहलू ,से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा
औकात.....रचनाकार ''अज्ञात''
आदरणीया "यशोदा अग्रवाल" द्वारा संकलित
मरने के बाद नीचे देखा ,
नज़ारे नज़र आ रहे थे,
मेरी मौत पे .....
कुछ लोग ज़बरदस्त,
तो कुछ ज़बरदस्ती
रो रहे थे।
आज हमारे प्रिय क्रांतिकारी चर्चाकार आदरणीय
"कुलदीप सिंह ठाकुर"
जी का जन्म दिवस है आज उनको समर्पित
'मेरी भावनायें'
आओ ! बैठो
हम बात करें
एक स्वर्णिम
इतिहास रचें
धूल सने
अभिलेखों को
मिलकर
स्नेह से साफ करें
आओ ! बैठो
देश की बात
करें
( प्रस्तुत अंश मेरे स्वयं के विचार हैं )
भूले -बिसरे यादों को एक नया नाम दें !
सादर अभिवादन
''बेटियाँ''..... ....... डा."कुँवर बेचैन"
आज के सुखद साहित्य यात्रा का प्रारम्भ साहित्य के 'सशक्त हस्ताक्षर' आदरणीय डा."कुँवर बेचैन" साहब की एक कृति के साथ
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं
''डरती हूँ''..आदरणीया "वंदना शर्मा"
तुम्हें याद ना करना,
यह मेरे बस की बात नहीं,
पर तुम्हें कोई ओर याद करे,
इस बात से डरती हूँ।
''सड़क''..आदरणीय ''अरुण रॉय''
सड़कें
धरती को नहीं छोड़ती
जो धरती को छोड़ते हैं
औंधे मुँह गिरते है
किसी न किसी मोड़ पर
फैक्ट्रियाँ सारी बंद करवाएं,
प्यार भावना को हम अपनाएं |
एक दूजे के तरफ ले जाएं,
''बिखराव''...आदरणीया "आशा सक्सेना"
जड़ें गहराई तक जातीं
डाली डाली पल्लवित होती
जब किसीका सामना होता
खुल कर भाव बाहर आता
एक से दो , दो से चार
आपस में जुड़ जाते
"शब्द" आदरणीया "मीना शर्मा"
अनजाने भावों से मिलकर
त्वरित मित्रता कर लेते,
और कभी परिचित पीड़ा के
दुश्मन से हो जाते शब्द !!!
''लम्पट बाबा'' --आदरणीया "रेणु बाला"
गुरु ज्ञान की डुगडुगी बजायी -
विवेक हरण कर जनता लुभाई ,
श्रद्धा , अन्धविश्वास में सारे डूबे -
हुई गुम आडम्बर में सच्चाई ;
बन बैठे भगवान समय के
खुद बन गये काशी और काबा !!
आत्मविश्वास मनुष्य में समाहित अमूल्य रत्न मणि है।
आत्मविश्वास एक ऐसी पूंजी है
जो मनुष्य की सबसे बड़ी धरोहर है।
ज़द्दोज़हद ...आदरणीया -''सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना''
उफ्फ बरसाती रात
कहीं जीवन हेतु संघर्ष अविराम
नदियों का राक्षसी उफान
और डूबा हुआ सारा घर-बार
सड़क पर सिमटाए अपना
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले ....... आदरणीय जगदम्बा प्रसाद "हितैषी"
जुदा मत हो मेरे पहलू ,से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा
औकात.....रचनाकार ''अज्ञात''
आदरणीया "यशोदा अग्रवाल" द्वारा संकलित
मरने के बाद नीचे देखा ,
नज़ारे नज़र आ रहे थे,
मेरी मौत पे .....
कुछ लोग ज़बरदस्त,
तो कुछ ज़बरदस्ती
रो रहे थे।
"कुलदीप सिंह ठाकुर"
जी का जन्म दिवस है आज उनको समर्पित
'मेरी भावनायें'
आओ ! बैठो
हम बात करें
एक स्वर्णिम
इतिहास रचें
धूल सने
अभिलेखों को
मिलकर
स्नेह से साफ करें
आओ ! बैठो
देश की बात
करें
( प्रस्तुत अंश मेरे स्वयं के विचार हैं )











