
अभिनन्दन स्वीकारें..
आज का अंक
ट्रिपल सेवन..
कुछ खास न होते हुए भी खास है..
आप जो हमारे आस-पास हैं
ट्रिपल सेवन..
कुछ खास न होते हुए भी खास है..
आप जो हमारे आस-पास हैं
नौवां माह शुरु हुआ है आज से
बस ....प्रसव होने को है ,,,
नवागत 2018 का
बस ....प्रसव होने को है ,,,
नवागत 2018 का
अाज की पसंदीदा रचनाओ से.....
कल 31 अगस्त को आदरणीया अमृता प्रीतम जी का जन्म दिन था
पढ़िए उनकी एक कविता...
1919-2005
कविता मंच में.....रोजी
नीले आसमान के कोने में
रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
सफ़ेद गाढ़ा धुआँ उठता है
कल 31 अगस्त को आदरणीया अमृता प्रीतम जी का जन्म दिन था
पढ़िए उनकी एक कविता...
1919-2005
कविता मंच में.....रोजी
नीले आसमान के कोने में
रात-मिल का साइरन बोलता है
चाँद की चिमनी में से
सफ़ेद गाढ़ा धुआँ उठता है

रुपये को सब कुछ समझने वालों
एक बार आजमा लो...
कृषकों की शरण न जाकर तुम,
रुपये से भूख मिटा लो.....
ऐ जिन्दगी, इक तू ही तो है बस, मैं और मेरे दरमियाँ!
खो सा गया हूँ मुझसे मैं, न जाने कहां!
ढूंढता हूँ खुद को मैं, इस भीड़ में न जाने कहां?
इक तू ही है बस और कुछ नहीं मेरा यहाँ!
अब तू ही है बस मैं और मेरे दरमियाँ!

लगाकर राम का आता, मुखौटा अब तो' रावण भी
न जाने औ छुपे कितने यहाँ शैतान बैठे हैं।
कोई किस्सा नहीं बस दर्ज ये तो इक हकीकत है
ये सब "होरी" यहाँ दिल में लिए "गोदान" बैठे हैं।
"मन के पाखी" में...क्षणिकाएँ
मानव मन का
स्थायी निवासी है
रह रह कर सताता है
परिस्थितियों को
मनमुताबिक
न देखकर।

गलत ईंट......रश्मि शर्मा
एक सूत बराबर थी
खाई
जोड़ने के बजाय
दो ईंट तुमने हटाईं
दो मैंने
खिसकाई।

मधुर गुंजन में....आकलन
''चलिए, आपको घर छोड़ दूँ,''रेवा ने उसे सहारा देते हुए उठाया|
''मैं चली जाऊँगी''
''नहीं, आप स्कूटी पर बैठें , मैं चलाकर ले जाऊँगी' 'रेवा ने सख्ती से कहा|
वह पीछे बैठ गई|
''मेरी स्कूटी खराब थी इसलिए...''
उसकी प्रश्न भरी नजरों को समझ कर रेवा ने मुसकुरा कर स्वयं ही कह दिया|

यादें में....जो गुज़र गया ..वो कल था ...!!!
कल बहारें थी ,
सपनों का दौर था
आज वीराने हैं ,
खांसी का शोर है
वो कल था, ये आज है .....
और भी है..पर बस
आज यहीं तक
आज्ञा..
यशोदा .....
"मन के पाखी" में...क्षणिकाएँ
मानव मन का
स्थायी निवासी है
रह रह कर सताता है
परिस्थितियों को
मनमुताबिक
न देखकर।
गलत ईंट......रश्मि शर्मा
एक सूत बराबर थी
खाई
जोड़ने के बजाय
दो ईंट तुमने हटाईं
दो मैंने
खिसकाई।
मधुर गुंजन में....आकलन
''चलिए, आपको घर छोड़ दूँ,''रेवा ने उसे सहारा देते हुए उठाया|
''मैं चली जाऊँगी''
''नहीं, आप स्कूटी पर बैठें , मैं चलाकर ले जाऊँगी' 'रेवा ने सख्ती से कहा|
वह पीछे बैठ गई|
''मेरी स्कूटी खराब थी इसलिए...''
उसकी प्रश्न भरी नजरों को समझ कर रेवा ने मुसकुरा कर स्वयं ही कह दिया|

यादें में....जो गुज़र गया ..वो कल था ...!!!
कल बहारें थी ,
सपनों का दौर था
आज वीराने हैं ,
खांसी का शोर है
वो कल था, ये आज है .....
और भी है..पर बस
आज यहीं तक
आज्ञा..
यशोदा .....

