सादर अभिवादन...
लगातार..
अनवरत बीतते
लगातार..
अनवरत बीतते
जा रहे हैं दिन..
वो कहते हैं न....
वो कहते हैं न....
निकल गया हाथी...
बाकी है पूँछ....
बस आने को है
सन 2018.....8+1+2 बराबर
बस आने को है
सन 2018.....8+1+2 बराबर
नौ दो ग्यारह....
आज पढ़ी रचनाओं मे से.........
कुछ बूंद उन शबनमी निगाह के,
कुछ दर्द मेरे सीने के, यही
सब तो हैं ख़ूबसूरत
वजूहात, बिंदास
मेरे जीने के।
वो आज
भी है दिलकश ओ हंसीं,
''आशु, यहाँ तुम्हारे और मेरे पापा- मम्मी और सब भाई- बहन मौजूद हैं| मैं सबके सामने तुम्हारी माँग भरना चाहता हूँ,'' कहते हुए आकाश ने डिबिया निकाली किन्तु आशु ने महीन आवाज में धीरे धीरे कहा,''मैं जाते जाते रिश्तों में नहीं बँधना चाहती आकाश| मुझे याद तो रखोगे न'', अब आशु की आँखों में कोई बूँद न थी, बस प्रेम था जो छलक रहा था|
रेलगाड़ी की पटरियां सिखाती हैं
कि दो लोग कितने ही क़रीब क्यों न हो,
उन्हें इतना क़रीब नहीं होना चाहिए
कि अपना अलग अस्तित्व ही खो दें.
ऊँचे ओहदों पर आसीन
टाई सूट बूट से सुसज्जित
माईक थामे बड़ी बातें करते
महिमंडन करते युद्ध का
विनाश का इतिहास बुनते
संवेदनहीन हाड़ मांस से बने
स्वयं को भाग्यविधाता बताते
शुष्क हो चलें हैं
जीवन के विचार
पत्ते तो लगे हैं
सूखी डालियों पे
झड़ रहें हैं
रह-रह कर
अश्रु सा !
धरा की कोंख में
महापाश में महानंदा के
कमसीन सी, कोशी खिल गयीI
संग सोन पुन पुन रास में
गाँव गँवई घर झील भईI
बजरी बिजुरी, कपार किसान के!

शब्द बीजों
से उपजी
शब्दों की
लहलहाती
फसल हो या
सूखे शब्दों से
सूख चुके
खेत में पढ़े हुऐ
कुछ सूखे शब्द
बस देखते रहिये

