अरबों साल पहले हमें जीवन मिला ! परन्तु हमने इसका क्या किया ? मानव विकास की सीढ़ियां चढ़ीं , एक कोशिकीय से बहुकोशिकीय
परिणाम
मानव की उत्पत्ति
बेहतर जीवन का निर्माण , एक विचारशील समाज की आधारशिला
समय के साथ स्वार्थपरक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रकृति का दोहन ! आने वाली पीढ़ी के भविष्य को नज़रअंदाज करते हुए सीमाओं का निर्धारण। हम विस्मृत करते जा रहे हैं
पृथ्वी पर व्याप्त संसाधनों की लड़ाई
मरती संवेदनायें ,लघु होते रिश्तों के दायरे
रिश्ते भी आज जीवित हैं केवल उद्देश्यों की पूर्ति हेतु। परन्तु कुछ तो है जो हमें आज भी बाँधे रखे है एकता के सूत्र में !
हम भारतवासी एक क्षण को सभी स्वार्थपरक उद्देश्यों को दर किनार कर बँधते हैं इस पावन पर्व के अनमोल डोर में,जो याद दिलाता है हमारा कर्त्तव्य अपनी प्यारी बहना के लिए। सूनी कलाई पर बहना का प्यार आनन्दित करता है हमें ,एहसास कराता है ,कोई तो है जिसका अनमोल प्यार उन सभी स्वार्थपरक उद्देश्यों से ऊपर है।
विकास का क्रम निरंतर आगे बढे ! रिश्तों के इस प्यारे बंधन के साथ ,अपनों के होने का एहसास
''पाँच लिंकों का आनंद''
परिवार की ओर से रक्षाबंधन के इस पावन 'पर्व' पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनायें !
कभी -कभी कुछ बातें कहीं नहीं जाती और जब बात हो आज के पावन पर्व की तो हर रचना एक ही दुआ करती है अपने भाई के लिए कि भैया तुम जीवन में सबकुछ पाना जिसके तुम हक़दार हो और जब कभी दुःख में होना मुझे अवश्य याद करना। तेरी ये बहना हमेशा तेरे साथ खड़ी होगी !
भाई -बहन के इस प्यार भरे रिश्तों को
शब्दों में न कह पाऊँगा
बोलती रचनायें आपको अवश्य दिखाऊँगा !
सादर अभिवादन
दोहे "निश्छल पावन प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
राखी लेकर आ गयी, बहना बाबुल-द्वार।
भाई देते खुशी से, बहनों को उपहार।।
--
रक्षाबन्धन पर्व का, दिन है सबसे खास।
जिनके बहनें हैं नहीं, वो हैं आज उदास।।
मेरे घर न आना भैया
आदरणीय ''साधना वैद'' जी की एक
'कृति'
रक्षा बंधन का त्यौहार है
हर बहन का अपने भाई पर
अटूट विश्वास और
अकथनीय प्यार है !
श्रावण की पूनम
आदरणीय ''अनीता जी'' की एक रचना
बेला और मोगरे की सुगंध से सुवासित हुई हवा
आया राखी का त्योहार गाने लगी फिजां !
भाई-बहन के अजस्र निर्मल नेह का अजर स्रोत
सावन की जल धाराओं में ही तो नहीं छुपा है !
भैय्या तेरी याद
आदरणीय 'श्वेता जी' की एक मधुर रचना
बचपन की वो सारी बातें
स्मृति पटल पर लोट गयी
तुम न आओगे सोच सोच
भरी पलकें आँसू घोंट गयी
भाई के लिए एक प्यारी कविता
आदरणीय ''अर्चना सक्सेना'' जी की एक
'कृति'
मटक-मटक के नाच दिखाता
सारे घर का दिल बहलाता
रीदी-रीदी कह कर मुझसे
मेरे पीछे भागा आता
कैसे ?.........
आदरणीय ''मीना शर्मा'' जी की एक हृदयस्पर्शी
'रचना'
जाने बदला क्यूँ रुख हवाओं का,
मिजाज़ रुत का भी है बदला सा !
प्यार का फलसफा सदियों से वही
वक्त के साथ हम बदलें कैसे ?
'लघु कथा'
राजा की बीमारी बढ़ती गई। सारे नगर में यह बात फैल गई।
तब एक बूढ़े ने राजा के पास आकर कहा, ''महाराज,
आपकी बीमारी का इलाज करने की मुझे आज्ञा दीजिए।
''राजा से अनुमति पाकर वह बोला,
''आप किसी सुखी मनुष्य का कुरता पहनिए,
अवश्य स्वस्थ हो जाएँगे।''
अंत में मेरी ''भावनायें''
दे ! अपने स्नेह की डोर
और मुझे कुछ भान नहीं
वृष्टि कर तूं अमरप्रेम की
और मुझे कोई चाह नहीं
बाँध मुझे फ़ेरे विश्वास के
मिले मुझे एक राह नई
हटा अँधेरा ! जीवन से मेरे
बन ! 'बहना' एक आस नई







