ओ ! 'राही'
तूं सुन ले ! रे
'एहसास' हृदय के
चुन ले ! रे
'नज़दीक' ही हैं
वे स्वप्न तुम्हारे
व्यर्थ 'माज़रा'
'आत्मभ्रमण' का
देख ! तनिक
अंतर्मन में,
सादर अभिवादन
आपसभी आदरणीय, पाठकों का
शब्दों की दुनियां भी अजीब है
हमारे कोमल हृदय को अपने शब्दों की जालिका में उलझाती !
सुख-दुःख रुपी पोत पर ब्रह्माण्ड की सैर कराती !
ख़ैर हम आज की रचनाओं की ओर
अपने आवारा मन को ले चलतें हैं
"नज़दीकियाँ" ........
आदरणीय 'रवींद्र सिंह यादव जी' जिनकी लेखनी कौशल का मैं मुरीद हूँ
आदरणीय 'रवींद्र सिंह यादव जी' जिनकी लेखनी कौशल का मैं मुरीद हूँ
ये घड़ी रुकी रहे
रात जाए अब ठहर,
दीवानगी का ये ख़याल
बेताबियों को भा गया।
देखने चकोर चाँद को
नदी के तीर आ गया।
"खामोशियाँ".....
आदरणीय,राकेश जी "राही" जो लेखक होने से बेहतर एक 'अच्छा पाठक' होने में विश्ववास रखते हैं ,
जो इनकी साहित्य के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाती है। हम इनका सम्मान करते हैं
आदरणीय,राकेश जी "राही" जो लेखक होने से बेहतर एक 'अच्छा पाठक' होने में विश्ववास रखते हैं ,
जो इनकी साहित्य के प्रति समर्पण की भावना को दर्शाती है। हम इनका सम्मान करते हैं
बड़ी उम्मीद ले कर तेरे दर पर आया हूँ,
नाउम्मीद का ख्याल भी, बेचैन करती है।
"एहसास".......
आदरणीय, "ऋतु आसूजा" जी जिनकी रचना बताती है जीवन के सच्चे 'एहसास'
आदरणीय, "ऋतु आसूजा" जी जिनकी रचना बताती है जीवन के सच्चे 'एहसास'
एहसास की रूह से आह निकली
बस करो एहसासों से खेलने का
शौंक ना पालों ।
"आत्म भ्रमण"......
आदरणीय, "शुभा जी" भ्रमर रूपी मन की व्याख्या करतीं हैं
आदरणीय, "शुभा जी" भ्रमर रूपी मन की व्याख्या करतीं हैं
कब से खोज रही थी
जिस निर्मल प्रेम को
देखा तो दुबका बैठा था
इक कोने में
जगाया , झकझोर के उठाया
"ये क्या है माज़रा".....
आदरणीय, "मीना गुलयानी" द्वारा रचित ये रचना जीवन से हजारों प्रश्न करती है
आदरणीय, "मीना गुलयानी" द्वारा रचित ये रचना जीवन से हजारों प्रश्न करती है
जिंदगी तो मेरी इक लम्बी सुरंग है
जहाँ पे खड़ा हूँ मै वहीँ कोई सिरा
"पाँच लिंकों का आनंद'' परिवार के नवीन सदस्य के रूप में यह मेरी पहली प्रस्तुति है,
समस्त आदरणीय पाठक एवं लेखकगणों के सहयोग का आकांक्षी
समस्त आदरणीय पाठक एवं लेखकगणों के सहयोग का आकांक्षी
आज्ञा दीजिए
धन्यवाद।
"एकलव्य"



