सादर अभिवादन
लघुकथा-कविता का तीसरा पाक्षिक अंक
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अगला अंकः 30 अगस्त 26 को
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रचना प्रेषण तिथिः 28 अगस्त 26
कल आखिरी दिन है
कल आखिरी दिन है
विषयः रक्षा बंधन, जगराता, व्रत
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आज जरूरत है उसी परंपरा को जीवित कर सज्जनों के साथ-साथ दुर्जनों की वंशावलियों की भी पूरी कुंडली को जनता-जनार्दन के सामने लाने की ! उनके और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए सारे कारनामों को जिनके अतीत के सच पर झूठ का चमकीला आवरण चढ़ा, असलियत छिपा, उनको महिमामंडित कर, अवाम को सच के सिवा कुछ और ही दिखा-समझा कर पीढ़ी दर पीढ़ी जो गलत इतिहास पढ़ाया-समझाया गया, उसका पर्दाफाश करने की ! वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के सामने सच रखने की ! उनके दिलों में राष्ट्र प्रथम की भावना सुदृढ़ करने की ! जिससे किले के दरवाजे की सुरक्षा पुख्ता हो जाए, अभेद्य हो जाए !
उस दिन’जुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।
अविकल, कोहरे में ढकी ये सुंदर
घाटियां, पहाड़ों से बहते हुए
ख़ूबसूरत वेगवान झरने,
आज भी बिखेरते हैं
ज़िन्दगी में रंगीन
सपने,
दोस्ती भी चाय की तलब-सी है,
जब लगे तो मिले बिना कहाँ रहती है।
झटपट फोन घुमाया,
मिलने का वक्त और जगह तय हो आई,
फिर फोन रखने की देर थी बस—
एक प्यारी-सी शाम चली आई।
थोडी थोड़ी गल रही है
थोड़ी थोड़ी जल रही है
है पुरानी वेदनाये
गीत में जो ढल रही है
चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए
ये पैसे मांगेगा ज़रूर, यही सोचते हुए मांगे उसे रुपए देने के लिए अपने पर्स में हाथ डाला इससे पहले मैं उसे रुपए देती इससे पहले उसने अपने
कंधे पर झूलते हुए झोले से तीन साड़ियां निकाली और कहने लगा रु. नहीं
चाहिए दीदी, हो सके तो इसमें से एक साड़ी खरीद लीजिए,
मुझे ताली बजा कर मांगने वाली छवि से निकलने में मदद मिलेगी।
सादर समर्पित
वंदन

