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सोमवार, 24 अगस्त 2026

4844...प्रवासी पंछी अनजान देश में ढूँढे बसेरा...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

आइए पढ़ते हैं सोमवारीय अंक में पाँच चुनिंदा रचनाएँ-

सरगोशियों के स्वर 

कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है" कवि दैनिक जीवन के बेहद सूक्ष्म बिंबों से मनुष्य की अंधी तृष्णा और संतोष के अंतर को उघाड़ते हैं। "गौरैया" कविता में पक्षी और मनुष्य के चरित्र की तुलना दृष्टव्य है:

"गौरैया / रोज आती है / एक मुट्ठी चावल से / बस चार दाने ही उठाती है..."

"आदमी / चावल के बोरों की गिनती करते हुए / कभी नहीं थकता है"

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खोज

जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में

 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

प्रवासी पंछी

प्रवासी पंछी

अनजान देश में

ढूँढे बसेरा

 

छूटे माँ बाप

छूटा कुल कुनबा

गाँव शहर

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ग़ालिब हुआ

कोई इधर गया, कोई उधर गया

कोई भी न मेरी जानिब हुआ

न मिलता है वो, न करता सलाम 

जब से वो शख़्स साहिब हुआ

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इस्मत चुगताई: बागी तेवरों वाली लेखिका, ज‍िन्होंने मौत के बाद दफ्न होने के बजाय दाह-संस्कार को चुना

ल‍िहाफ नामक कहानी ने उस दौर की महिला लेखिकाओं के लिए खींची गई 'लक्ष्मण रेखा' को हमेशा के लिए पार कर लिया. इस्मत चुगताई ने वो बंद दरवाजा खोल दिया, जिससे होकर आने वाली कई पीढ़ियों की लेखिकाओं ने समाज के तमाम वर्जित (taboo) और अछूते मुद्दों पर बेखौफ होकर अपनी आवाज बुलंद की. 

 *****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

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