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बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

467....दूध मत दिखा दही जमा

सादर अभिवादन
शोर शुरू हो गया है फटाकों का
बच्चे भूल जाते हैं पढ़ाई
स्कूल से आने के बाद
रम जाते हैं फोड़ने
फटाखे..

आज की मेरी पसंद की रचनाएँ.....

अभी-अभी गरम और ताजा..
‘उलूक’ 
मन ही मन 
मुस्कुराया था 
हजारों में 
एक ही सही 
पर था कहीं 
जो अपने 
गुस्से का 
इजहार 
कर पाया था 
असली मतदान 
कर उस अकेले ने 
सारे निकाय को 
आईना एक 

दिखाया था । 
नाक ‘ए’ की नाक के नीचे की नाव छात्रसंघ चुनाव



पिता ने वसीयत में रामफल को कभी शहर न जाने की हिदायत दी थी
पर जिद्दी था शहर, कि वो रामफल को शहर लाकर ही दम लेगा
सो उसने कर दिखाया


दुकानदार ने कहा “ भाईसाहब , मैं आप से क्या कहूँ ? उसमें एक कमी थी . मेरे प्रश्नों का उत्तर उसने दिया तो , पर श्रीमान् , महोदय जी और साहब जैसे शिष्टतासूचक शब्दों का कही प्रयोग नहीं किया.  व्यापार की सारी सफलताएँ शिष्ट व्यवहार पर ही आधारित है , शिष्टता के अभाव में तो मेरा सारा व्यापार ही चौपट हो जायेगा .”



आँखें बंद हैं ,
और एक-एक कर पुरानी घटनाएं 
यादों के सहारे बाइस्कोप के चित्रों की तरह सरकती जा रही है ,
पचपन में बचपन की चाह.........अर्चना चावजी 



ये कथा है लूट की मार की टकरार की
सारथी जिसके रहे
शिवापाल, रामगोपाल,अमर चाटुकार की
सत्य दिग्घोषित हुआ,
प्रजापति जी सार्थक सर्वदा
निरन्तर लुटी गोमती और नर्मदा
अथ श्री सैफई कथा ....विक्रम प्रताप सिंह


अब अंत में शीर्षक कथा
दूध देख 
कर आता 
है तो थोड़ा 
जामुन भी
मिला 
लिया कर
दही बना 
कर चीनी 
के संग भी
कभी किसी 
को खिला 
दिया कर
खाली खाली 
दूध यहाँ 
मत लाया कर
अभी तक अचर्चित
......................
आज्ञा दें यशोदा को
सब छुट्टियों के मूड में हैं
पर लिक्खाड़ की कहाँ छुट्टी होती है
लिखते रहता है...
यहाँ-वहाँ....

सादर




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