सादर अभिवादन
कुछ सोच .....
आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.
मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.
बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.
- शालिनी
देखें कुछ रचनाएं
कभी चाँद रात, तो कभी अंधकार मुसलसल,
चंद ख़्वाब सजाए बचा के दुनिया के नज़र से,
भटका किए यूं तो भीड़ भरी राहों में दर ब दर,
कभी रहे मुक्कमल बेख़बर, अपने ही शहर से,
दौड़ती चली जा रही है ट्रेन,
घुप्प अंधेरा है बाहर,
बेफ़िक्र सो रहे हैं यात्री,
कुछ, जो अभी-अभी चढ़े हैं,
सामान लगा रहे हैं अपना,
कुछ, जो उतरनेवाले हैं,
समेट रहे हैं अपना सामान,
कभी सोचता हूँ तो सिहर जाता हूँ,
बिखर जाता हूँ,
अब आप जान लो कि
कैसी दर्द भरी मेरी जवानी थी।
रोटी मिले, कपड़ा मिले,
छत मिले हर एक सिर को,
माथे पर हर इंसान के,
सुकून बेशुमार चाहिए।
आपको धोखा
देने वाले
आपके अपने ही
होते हैँ,
वे या तो
आपके परिवार के होंगे
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आज बस
सादर वंदन





