सादर अभिवादन
प्रेम मास का तीसरा दिन
माँ सरस्वती को प्रणाम
चल सखि ! देखें, सरसों फूली
भँवरे गुन-गुन गायें फागुन
कोकिल, मोर, पपीहा टेरें
अमराई की गंध समो ली
हर्षाया उर, हर गम भूली !
उपरोक्त रचना
आदरणीय अनीता निहलानी जी की है
पिछले सप्ताह हमने
एक लेखन कार्यक्रम की
आयोजन की सूचना दी थी
उसी को परिप्रेक्ष्य मे
ये रचना प्राप्त हुई है
मै हृदय से आभार व्यक्त करता हूं
चल सखि ! देखें, सरसों फूली
हर्षाया उर , हर गम भूली !
हुलस उठी बगिया देखो ना
नव यौवन वृक्षों पर आया
लतर हरी भयीं भर-भर फूलीं
गाया मन ने, हर ग़म भूली !
मन ही मन की न समझे
मैं मनका मनका फेर रही हूँ,
घट घट रमते बनमाली सा
नन्दन वन को हेर रही हूँ।
शीश मेरे माँ हाथ तो रख दो
झूम झूम पग से लग जाऊँ।
अंतरमन शुचि सुंदर हो मां
राग विकार से रिक्त हो जाऊँ!
पर्वत का ऊँचा शिखर
ओढ़े है किंशुकी सुमन
सरसों के फूलों भरा
बासन्ती मादक उपवन
करने कामाग्नि दहन
केशरिया वस्त्र पहन
मानों कोई सन्त आ गया
देखो बसन्त आ गया।
कुछ हकीकत चुभी है पैरों में,
कांच का ख्वाब है जो टूटा है.
मैं उधर तुम इधर चली आईं,
चश्म-दीदी गवाह बूटा है.
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अब बारी है लेखन कार्यक्रम की

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अब बारी है लेखन कार्यक्रम की
सखि वसन्त आया
भरा हर्ष वन के मन
नवोत्कर्ष छाया
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी
पिक-स्वर नभ सरसाया
ये पंक्तियां पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की है
आपको इन पंक्तियों में लिक्खे शब्दों को लेकर
एक कविता , गीत, ग़ज़ल, या व्यंग्य लिखना है
हर कोई लिख सकता है केवल मुझे छोड़कर
और लिखकर सोमवार दिनांक 10 फरवरी 2025 तक
लिख कर संपर्क फार्म में पोस्ट कर दीजिए
इसलिए रचनाएं रविवार 09 फरवरी से पहले पोस्ट करिए
वह रचना अगले सोमवार को फ्लेश हो जाए
उत्कृष्ट रचनाओं के लिए प्रशस्ति पत्र तैयार है
प्रयोगात्मक गतिविधि है आपकी सजगता पर निर्भर है
कि ये प्रयोग आगे बढ़ाएं या नहीं ??
सादर ....
आज बस
वंदन

