सप्ताह की शुरुआत सोमवार और प्रस्तुतिकरण को आगे बढाते हुए...
दुःख का अंधकार ठहरा ही रहेगा!
टिमटिमाती रौशनीगुजरता हुआ सुख है
फैला अंधकारठहरा हुआ दुःख है
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बहुत पुरानी , घोर बचपन की बातें याद आ रही है.
मुझसे पाँच वर्ष छोटे भाई का जन्म तब तक नहीं हुआ था. पिताजी का ट्रांस्फ़र होता रहता था - उन दिनों हमलोग तब के मध्य-भारत के एक कस्बे अमझेरा में रहतेथे. हमारे घरके सामनेवाले घर में एक..
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हमारी समझ के बीच
ऊँचे पहाङ हैं..
समझना मुश्किल है
उस पार की समझ ..
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तेरे कारण ही जग रूठा
जब सोलह श्रृंगार किया
तो बैरी हुआ सलोना प्रीतम
भूल गई अपनी परछाईं
बैठ बजाती रही मृदंगम
जितने फेरे लिए अग्नि के
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दर्दोगम को दिल में छुपाये रखती है
कई ख्वाब आँखों में सजाये रखती है
जिन्दगी को तपिश की लपटों से बचाती हुई..
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कौल पिता का, भटके जंगलों में, सन्यासी राम
निभाते रहे, दशरथ का वादा, करुणाधाम
हर ली सीता, क्रोधित रावण ने, हुआ अनर्थ
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
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