सादर नमस्कार
सादर नमस्कार
ओल्ड इज़ गोल्ड
अब रचनाएँ पढ़िए
ओल्ड इज़ गोल्ड
अब रचनाएँ पढ़िए
द्विअर्थी मुहावरे
जिनके बीच
दुरूह हो गयी है ,
आत्मीय शब्दों की
सहज व्याख्याएं !
और हम
हैं कि
घुसने देते है ,
इस शब्द प्रदूषण को
घर के भीतर !!
सुख का ही नहीं दुःख का भी,
अटूट रिश्ता होता है,
वर्ना क्या ऐसे,एकांत का
हाथ थामे,कोई दिखता है?
वीराने में जैसे इक उम्मीद का,
फूल खिल आया है,
शायद वक्त ने हताशा से,
बचाने को,हमें मिलाया है।
बेमानी हैं लड़कियों की बराबरी की बातें
खोखले हैं समाज के सारे दावे
आज भी जकड़ी हुई हैं वो रूढ़ियों की जंजीरो में
जैसे सपने में भागते हैं हम
और बार-बार कोशिश करने पर गिर जाते हैं
हर विकल्प को हारकर
मैं बची हूँ वही आम लड़की
जिसके हिस्से में दोराहे नही होते
वह समझोतों की बिसात पर
अंततः खुद को सिर्फ एक औरत
साबित कर पाने तक ही समर्पित है
रुकी हुई है कलम
टिकी हुई कागज पर
कि कोई ऐसी बात कह दूँ
कोई सत्य ऐसा लिख दूँ
कि आसमान का पट सरक
सहसा ही सतरंगी धूप निकल आये...
कि स्याह अँधेरी रात
झटपट सितारों से जगमगा जाये...
*****
बस




