सादर अभिवादन
आज रात होली है
गुलाल जरूरी है
आज की रचनाएँ
तुम्हारे हाथों में
न पिचकारी थी,
न बाल्टी,न गुब्बारा था,
सूखा रंग लगाया तुमने,
फिर मैं इतना कैसे भीग गया?
वो कौन, जो पहले, स्वप्न सा आया,
फिर, पलकों में समाया,
इंद्रधनुष सी, कैसी, वो परछाईं,
छुई-मुई सी, मुरझाई,
है वो कोई भरम, टूटे जो पल-पल,
कैसा वहम, छूटे ना इक पल!
आहिस्ता आहिस्ता करके,
पिघलना पड़ता है।
आसान नहीं मुहब्बत,
बहुत जलना पड़ता है।
बुझती भी नहीं आग दिल की,
जलकर राख भी नहीं होता है।
बुरा न मानो बोल के ,
होली की हुडदंगी जात ,
तोड़फोड़ और गालियाँ से ,
मन की निकाले भड़ास .
लोढ़त पोढ़त दिन गयो ,
गयो न मदहोशी का फेर .
मधु मुन्नका मिठाई संग ,
ज्यों सेवन किये रहे ढेर .
ऐ जानम ! ..
आओ ना आज ..
आज की रात ..
मिलकर साथ-साथ ..
छत पर चाँदनी में
डुबकी लगायी जाए
और डाले हुए गलबहियाँ
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आज बस
कल सखी आएंगी
सादर





