शीर्षक पंक्ति: डॉ.सुशील कुमार जोशी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
शनिवारीय अंक में आज की पसंदीदा रचनाओं के साथ हाज़िर हूँ।
जूते फटे भी रहें तब भी कुछ पालिश तो होनी ही चाहिए
दुकाने खोली हुई किसी की भी हों खुली रहनी भी चाहिए
जमीर हो कहीं भी रखा हुआ किस्मत धुली होनी ही चाहिये
नोचने का जज्बा जरूरी है उंगलियाँ खडी होनी भी चाहिए
नाखून हों से मतलब नहीं खबर जहरीली होनी ही चाहिए
शायरी | दरमियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
दरमियां रात चली आई है
सुब्ह होने दो, मिलेंगे फिर से
चलो ...अपनी भावनाओं को
मौसम मान लो ...
फिर सोचो ......
सोकर उठे तो मौसम साफ,
मन शांत, प्रसन्न.....
पर एक घंटे बाद....
मौसम विभाग की सूचना...
भारी बरसात, तूफान...
कौन सा चाँद पहले डूबेगा,
जो झील में है वह
या जो झील के बाहर है वह?
या दोनों एक साथ डूबेंगे?
भारी मन से अर्जुन ने निर्णय लिया कि विभा को अपने माता-पिता के घर वापस चले जाना चाहिए। अलगाव आंसुओं और दिल के दर्द से रहित नहीं था, लेकिन यह अर्जुन के लिए उपचार का अपना रास्ता खोजने का एकमात्र तरीका था। विभा ने बच्ची को खूब प्यार किया और भारी मन से दोनों से विदा ली।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
