सादर अभिवादन..
आज से सावन का महीना चालू
शिवम् शिवम् शिवाय
आज गुरु पूर्णिमा भी है
अब देखिए रचनाएं
चिंतातुर कवि बैठे हैं
सोचते हुए
ये कहाँ आ गए हम
अब जाएंगे कहाँ
कि आज संवारा नहीं
फिर कल कैसे संवरेगा
जब भी कोई उद्दंड बच्चा वहां अपनी मां को ज्यादा तंग किया करता तो वह उसे
हरि सिंह नलवा का नाम लेकर डरा दिया करती थीं। वह उन्हें कहती थीं कि बैठ जा
वरना नलवा आ जाएगा और बच्चा भी तमाम शरारतें छोड़ आराम से बैठ जाता।’
कुसुम कलियाँ
कदाचित
कोमलता की
कुटिलता को
कोसती होंगीं
मैं बेचारा आफत मारा
हरदम रहा शराफत मारा
अब हूं बड़ी मुसीबत मारा
और फिरता हूं मारा मारा
बचपन में था प्यार का मारा
आज बस इतना ही
कल के लिए
में हूँ न
कल के लिए
में हूँ न
सादर


