नमस्कार ! देख रही हूँ कि पहले से ही रंगों की बहार है .......... होली सर चढ़ कर बोल रही है ........ सा र र र र र र ....... अब रंग चढ़ें कि भांग कुछ समझ नहीं आ रहा ....... फिलहाल तो मोबाइल चढ़ रहा ...... होली के आनंद में सबसे पहले पढ़िए मोबाईल - नामा
सेल्फी के खिचवाये में ,
चेहरा इतना सजाये,
कि दर्पणबा में खुद को देख के,
डरे चीख निकल जाये ।
होली का रंग और भंग की तरंग ......... यूँ भांग खाते नहीं फिर भी नशा तो सोच कर भी चढ़ जाता न ....... तो समझ लीजिये की होली चढ़ रही ........
बुरा न मानो होली है ........
अब मुझे तो न कोई पोस्ट नज़र आ रही और न ही कोई ब्लॉगर .......... आप यदि ठीक ठाक हैं तो खुद ही पहचान लीजिये ........ सबको होली की रंग भरी शुभकामनाएँ ........ लिखा मीठा लगे तो गुंझिया ....... तीखा लगे तो कांजी बड़ा समझ गुलाल लगा लेना ...... अबीर उड़ा देना ........ सा र र र र र .
यू ऍफ़ ओ पर सवार बेलगाम ख्यालों की उड़ान
तीर चलाया तो चलाया वरना
हाथ में पकड़ी कमान
बोलो कौन ?
कल पर है यकीन
सोच का करती हैं सृजन
दशा और दिशा बदल सकें
ऐसा करती हैं प्रयत्न
बोलो कौन ?
अतुकांत से परहेज़
छंद - छंद में है ज्ञान
नए शब्दों से परिचय
गूगल में उलझा पाठक परेशान |
ब्लॉग पर दस्तक उनकी
कर देती है क्षुधा शांत
ऊर्जा हो जाती है संचारित
टिप्पणी पा कर उनकी नितांत ।
उलझ उलझ जाती हैं
औरों की गलतियों पर
खुद ही परेशान रहती हैं
तर्क देती हैं मन भर भर ।
प्रवासी हूँ तो क्या
हिंदी रग रग में समाई है
जगह जगह की बात
संस्मरण में बताई है ।
पाँच लिंकों का आनंद
मिल जाता है सबको इनसे
ब्लॉग के ज़रिए ही
जुड़ी रहती हैं सबसे ।
जीवन की आपाधापी में
नई सोच और नया सृजन
पढ़ पढ़ कर करती रहती हैं
गूढ़ रचनाओं पर मनन ।
लोहे के घर से जो
छन कर आता है व्यंग्य
उस यात्रा में पाठक
रहता है संग संग ।
फलों से लदे ज्यों
झुके वृक्ष दीखते हैं
उसी तरह ये भी हमेशा
विनम्रता से मिलते हैं ।
हर विधा में सृजन का
पारावार नहीं
पढ़ते पढ़ते थक जाएँ
खत्म होता ये अम्बार नहीं ।
अपनी शर्तों पर जीना
प्रेम पगे रिश्ते पिरोना
दर्द को भी चन्दन बनाना
कष्ट में भी मुस्कुराना ।
तीन पंक्तियों में
सागर समाय
हर रचना मन में
उतर उतर जाय
रहस्य है कि रोमांच
जो लिखें वो सब है साँच
कभी अद्भुत हो, तो
कभी रहस्य बाँच .
प्रभु प्रेम बसा मन में
भक्तिभाव रस है
सोचने पर विवश हम
कितना सुन्दर जग है .
कर देती हैं कायल
अपनी नज़र से
सहमत होते रहिये
उनके सृजन से .
एकांत की तलाश में
जन्मजन्मान्तर की भटकन
सृजन के लिए
मन में लिए चटकन
ये मोह मोह के धागे
ये टोह टोह ले आये
सैनिकों की ज़िन्दगी के
किस्से हैं छाये |
कल्पना संग करती आँख मिचौली
मुट्ठी में सच की धूप भर ली
माना झूठ के अस्तित्व को भी
कड़वी बात सहज शब्दों में कर ली .
बोलो बोलो बोलो ........ कौन .. कौन ... कौन .....
समझ आ जाये तो वाह वाह ............ नहीं आये तब भी वाह वाह .......
यूँ तो कुछ पता नहीं क्या लिखा है ...क्या किया है ....... लेकिन आपको यदि कुछ पढना है तो बोलो कौन पर क्लिक कीजिये और पोस्ट पर पहुँच जाइए ......
जिसकी पोस्ट उसी के लिए होली का तोहफा मेरी तरफ से ........
सा र्रर्रर्रर र र र र र ................................ होली है भई होली है .........
रंगों की तरह आप सब पाठकों के जीवन में भी चमक बनी रहे ........ शुभकामनाओं के साथ
संगीता स्वरुप