नमस्कार ! नए वर्ष का पहला पर्व ...... मकर संक्रांति ....... कुछ लोगों ने 14 जनवरी को मनाया तो कुछ ने 15 को ........... यह त्योहार क्यों ख़ास है आइये जानकारी लेते हैं इस पोस्ट से ....
सूर्योपासना का पर्व है मकर संक्रांति
मकर संक्रांति आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व है। इसी दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। इसी दिन उत्तरायण शुरू होता है, अभी तक दक्षिणायण रहता है। खगोलीय दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण दिन है। पुराणों में कहा गया है कि दक्षिणायण देवताओं की रात और उत्तरायण देवों के लिए दिन माना जाता है। यह दिन दान, पूजा-हवन, यज्ञ करने के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ है। मकर संक्रांति से सम्बंधित कई कथाएं है-
इस विषय पर कुछ जानकारी आप काव्य रूप में भी ले सकते हैं .....
मकर सक्रांति
खिचरिया खाएँ श्रीभगवान! ..पद
खिचरिया खाएँ श्रीभगवान !
दाल-भात की बनी रे खिचरिया,पूजय सकल सुजान।
प्रात परात सजय हर्दी संग, खूब करय स्नान।
माथ लगे चरनन म छिटके,भिच्छुक पावत दान।
इस पर्व के बाद से सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर जाता है ....... मन जाता है कि देवताओं के दिन आ जाते हैं सोये देव जाग जाते हैं .... इसी तरह की आशा करता हुआ कवि कह रहा है कि भाग्य अब तो उत्तरायण में आ जाओ ......
अब तो उत्तरायण हो भाग्य मेरे !
माधुर्य कण्ठ का है तुझसे ,
तेरा शब्द-शब्द है यश मेरा !
ढल कविता में जो बह निकला
तू अलंकार, नवरस मेरा!
अतुलकोश सहेज भावों का
है कृतज्ञ बड़ा हृदय मेरा!
कोई अपनी भाषा से प्रेम करता है तो कोई देश से ....... तो कोई श्रृंगार रस में एक प्रेम गीत लिख देता है ......
एक प्रेम गीत -इत्र से भींगे हुए रुमाल वाले दिन
तुम्हें देखा
याद आए
खुशबुओं के ख़त,
चाँदनी रातें
सुहानी
और सूनी छत,
राग में
डूबे हुए
करताल वाले दिन.
अब ये रुमाल वाले दिन ...... गुलाब वाले दिन ...... चॉकलेट वाले दिन या फिर टेडी बियर वाले दिन बन गए हैं ...... और उनको आने में अभी एक महिना बाकी है ....लेकिन फिर भी कुछ लोगों के मन में अभी से सुरूर तारी है .....
तुझे अब इश्क़ में ही ज़िन्दगी मालूम होती है.
दिगम्बर ये तो पहली ख़ुदकुशी मालूम होती है.
कोई प्यासा भरी बोतल से क्यों नज़रें चुराएगा,
निगाहों में किसी के आशिक़ी मालूम होती है.
हवा के स्वर में हाहाकार था, रेत उससे दामन छुड़ा रही थी। वृक्ष एक कोने में चुपचाप पशु-पक्षियों को गोद में लिए खड़े थे।उनकी पत्त्तियाँ समय से पहले झड़ चुकी थीं। सहसा स्वप्न के इस दृश्य से विचलित मन की पलकें उठीं, अब उसने देखा सामने खिड़की से चाँद झाँक रहा था।
”हाँ! चाँद झाँक ही रहा था!! न कि दौड़ रहा था।” उसने फिर विश्वास की गहरी सांस भरी।
वक़्त के साथ अक्सर बहुत कुछ बदलता है ....... ऐसे ही मौसम भी बदलता रहता है ...... मौसम के बारे में सोचते सोचते ऐसा भी लगता है कि -----
आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा
कुछ मौसम ऐसे भी हैं जो मनुष्य ने बाजारवाद के चलते गढ लिये हैं. इनका आनन्द भी सक्षमतायें ही उठाने देती है. इसका सबसे कड़क उदाहरण मुहब्बत का मौसम है जिसे सक्षम एवं अमीर वर्ग वैलेन्टाईन डे के रुप में मनाता है फिर इस डे का मौसम पूरे फरवरी महीने को गुलाबी बनाये रखता है. फरवरी माह के प्रारंभ में अपनी महबूबा संग गिफ्ट के आदान प्रदान से चालू हो कर वेलेन्टाईन दिवस पर इजहारे मुहब्बत की सलामी प्राप्त करते हुए फरवरी के अंत तक यह अपने नियत मुकाम को प्राप्त हो लेता है.
रेडियो पर गीत बज रहा है...’आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा..आज मौसम...’
सच है कि मौसम बेईमान है ..... और ठण्ड भी काफी है ...... तो आज के लिए इतना ही बहुत है
....... पढ़िए और प्रतिक्रिया दीजिये कि आज की रचनाएँ कैसी लगीं ........
नमस्कार
संगीता स्वरुप