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सोमवार, 9 जनवरी 2023

3633 / चलो अंधविश्वासी हो जाएं

 

नमस्कार  !   उत्तर भारत  शीत लहर से ग्रस्त है , ऐसे में ब्लॉग्स  की पोस्ट को पढ़ कर लिंक लगाना और ये सोचना  कि पाठक नियमित रूप से पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया भी दें .......कुछ ज्यादती वाली बात है ........... टाइप करने में ही हाथ  काँप  रहे हैं .........खैर ........ कोशिश कर रही हूँ कि आप तक कुछ अच्छी रचनाएँ  पहुँचा सकूँ ..... 

लोग अक्सर विश्वास और अंधविश्वास को ले कर तर्क वितर्क करते हैं  और अक्सर आदर्शवादी कहते हैं कि अन्धविश्वासी नहीं होना चाहिए ........ लेकिन एक ब्लॉगर हैं जो सुझाव दे रही हैं  कि ...... 

चलो अंधविश्वासी हो जाएं


जैसे ही मैं पूजन पूरा कर के उठ रही थी कि एक छोटा सा चूहा ,जो हमारे घर में कभी नहीं दिखाई पड़ता,  चहलकदमी
करता दिखा और स्वतः ही मैं बोल उठी -अरे गणपति वाहन -और
मन एक तरह से शांत हो गया ।थोड़ी देर बाद एक़दम से ये ख़्याल 
आया कि मै,एक तथाकथित रूप से  वो  गृहणी  जो अंधविश्वा्सों
से बहुत दूर ही रहती है ,कैसे इस तरह का अंधविश्वास कर गई ।

इस पोस्ट को पढ़ कर तो सबका ही मन हो रहा होगा कि ऐसे अन्धविश्वासी बनने में कोई हर्ज़ भी नहीं है ........ हाँ जहाँ आप धर्म की आड़ में  इंसानियत को नज़र अंदाज़ कर दें और अपने कृत्य को धर्म की आड़ में सही माने ऐसा  अन्धविश्वासी  नहीं  होना चाहिए ..... यहाँ धर्म ग्रंथों के विरुद्ध नहीं हैं लेकिन उनकी आड़ में जो कृत्य किये जाते हैं उन पर विचार करें ...... 

किसी को हिंदू तो किसी को मुस्लिम तूने नाम दिया, 

किताबों वाले हाथों में पत्थर तूने थमा दिया।

स्याही से रंगने वाले हाथों को रक्तरंजित तूने करा दिया, 

प्रेम व सौहार्द की खुशबुओं से महकने वाले बागों में 

नफ़रत का बीज तूने लगा दिया।

यहाँ तो इंसानियत का पाठ पढाया जा रहा है ......... और दूसरी तरफ कि  आखिर जीवन क्या है ..... सुख - दुःख  सब कुछ मिला कर ही जीवन है ..........  खिलने के लिए मुरझाना भी होता है ...... 

जीवन है


जीवन है,
सिर्फ लहरों से काम नहीं चलता
कुछ स्थाई स्थिति बनाने की खातिर
सुनामी के कहर की भी जरूरत होती है 

सच है जब तक पीड़ा से न गुज़ारा जाए तब तक खुशियों का भी पता नहीं चलता ........ इस बात को समझाने के लिए कितना सही उदहारण दिया है ......


चाह मुक्ति की यह अनुपम है 

स्वयं का व जग का हित सधता, 

रिक्त हुआ उर जब भीतर से 

प्रियतम खुद ही आकर बसता  !


जहाँ पीड़ा है वहां अक्सर हम निःशब्द हो जाते हैं ....... ऐसे ही एक ये रचना है .....


कोहरे की चादर में लिपटी सांसें


टूटने से डरतीं 

वही कहती हैं जो सदियाँ

कहती आईं 

वे उठने को उठना और

बैठने को

 बैठना ही कहतीं आईं हैं |


कभी कभी कम शब्दों में रची गयी रचनाएँ  लम्बी  कविताओं से ज्यादा मारक होती हैं ....... अपनी बात कम से कम शब्दों में कह देना सबके वश की बात नहीं ........ पढ़िए कुछ ..... 

“क्षणिकाएँ”


अक्सर मैं 

हाथ की लकीरों में

तुम्हें ढूँढा करती हूँ 

क्या पता …

न जाने क्या ढूँढा करते हैं लोग हाथ की लकीरों में ..........अक्सर होता है ये कि  वक़्त का पता नहीं होता कि  भविष्य में क्या होना है ........ तभी कहा गया है कि कर्म करो  बाकी सब  ईश्वर की मर्ज़ी पर छोड़ दो ..... सत्य घटना पर आधारित एक कहानी बुनी गयी है .......... पढ़िए आप भी ..... 

अनूठी  मिसाल  

भारतीय वायुसेना के गरूण कमांडो ज्योति प्रकाश निराला पूरे एक साल बाद एक महीने की छुट्टी पर घर आए थे। माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं था और बहनें तो
भाई के आगे-पीछे घूम रहीं थीं,चार बहनों
का एक अकेला भाई परिवार का कर्ता-धर्ता.. माता-पिता के बुढ़ापे की लाठी.... सेवाभावी

और इस कहानी के बाद  न तो कोई और लिंक मुझे समझ आया और न ही कुछ लगाने का मन हो रहा है ...... मुझे लगता है कि आप लोग भी कुछ देर इस पर शांत चित्त  से मनन  करना चाहेंगे ...... आज बस इतना ही ....... फिर मिलते हैं ...... अगले सोमवार को ..... तब तक के लिए  विदा  ...... 

नमस्कार 
 संगीता स्वरुप . 




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