।।उषा स्वस्ति।।
"रसमसाती धूप का ढलता पहर,
ये हवाएं शाम की, झुक-झूमकर बरसा गईं,
रोशनी के फूल हरसिंगार-से,
प्यार घायल सांप-सा लेता लहर,
अर्चना की धूप-सी तुम गोद में लहरा गईं..!!"
धर्मवीर भारती
हानि-लाभ,जीवन-मरण,यश-अपयश विधि-विधान,कर्ज-फर्ज का दामन थामे आगे बढ़ चले कि ये जिदंगी अब सवाल कम करेगी।लिजिए ये साल भी चला और हम सभी की प्रस्तुतियाँ अपने अपने अंदाज में..
नजर उठाओ, नज़र अगर है
भली मुहब्बत, कभी नहीं थी
भला यही है, बचा भँवर है..
ब्लॉग से इतर..हम..कुछ दिनों से फर्ज के दामन से..ये रस्में जानी पहचानी सी कुछ अपनी सी,पनीली आँखों की कहानी सी..
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इल्लियाँ और तितलियाँ
बेचैन हैं कुछ इल्लियाँतितलियाँ बन जाने कोकर रही हैं पुरज़ोर कोशिशनिकलने कीकैद से अपने कोकून
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अस्आर मेरे
कुछ अस्आर मु-फा-ई-लुन (1-2-2-2)×4
सुनों ये बात है सच्ची जहाँ दिन चार का मेला।
फ़कत दिन चार के खातिर यहां तरतीब का खेला।
शजर-ए-शाख पर देखो अरे उल्लू लगे दिखने।
नहीं ये रात की बातें ज़बर क़िस्मत लगे लिखने।
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नई करेंसी धूम करेगी
भजिया अब घर नहीं बनेगी ।
जली पराली धुआँ भरा है साँसों में
भंडरिया क्या ख़ाक भरेगी ?
तपी दोपहर, चला नहीं..
खास अंदाज में बयान करतीं कविता के साथ.. इक नजर इधर भी..
संबधों के आँच में पकी अनुबंध सारे..
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गुनाहों की हद में आओ तो कहूँ।
कितनी मायाळी छुँयाळ* है ये आँखें,
आँखों से आँख लड़ाओ तो कहूँ।
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हमारी मिट्टी की ख़ुशबू, हमारे लोक के आलोक की अनुपम झलक इन लोकगीतों संग कुछ पल
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️





