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बुधवार, 14 दिसंबर 2022

3607.... आत्म-रंजन

सादर अभिवादन
आज मंच पर अतिथि चर्चा कार के रूप में
उपस्थित हैं आदरणीया अभिलाषा चौहान जी
आइये आज के अंक का आस्वादन करें।

अतिथि चर्चाकार के रूप में मुझे आज की प्रस्तुति का सौभाग्य प्राप्त हुआ है,मेरे तो भाग्य जाग उठे।

आज की चर्चा का विषय है 'आत्म-रंजन'और शीर्षक पंक्ति भी यही है। प्रतिष्ठित लेखिका आँचल पांडेय की यह रचना मन-मंथन करने पर विवश करती है।
हम कब तक सोते रहेंगे। ब्लॉग जगत भी सोया हुआ है और लोकतंत्र भी।आत्म-रंजन में यही भाव मुखर हुआ है।

मशालें बुझने लगी हैं,
अँधेरे की ताक़त बढ़ने लगी है,
और कर्तव्य-पथ से भटके हुए 
ढ़ीठ,आलसी,लापरवाह लोग सो रहे हैं।


सर्वत्र सुस्ती छाई हुई है जो हो रहा है जैसे हो
रहा है,हम उसी में खुश हैं।यथा स्थिति को अपना सौभाग्य मानकर जीने की हमारी प्रवृति ने इस उदासीनता को स्थायी बना दिया है।कभी-कभी कौए की चोंच में अनारकली आ जाती है।उसके भाग्य जाग जाते हैं ।ऐसा ही कुछ हमारे देश का हाल है। आदरणीय गोपेश मोहन जसवाल जी की रचना का आनंद‌ लें-


सुकुल साहब लम्बी चौड़ी हवाईजहाजनुमा गाड़ी में सवार हो कर जब रिश्ता पक्का करने के लिए डॉक्टर मेवालाल शर्मा के गाँव पहुँचे तो उनके पिताश्री अपने होने वाले समधी की शानो-शौकत देख कर सकते में आ गए. मेवालाल के पिताश्री के साथ उनके परम घाघ फूफाश्री भी थे जो कि सुकुल जी के वैभव से उतने प्रभावित नहीं लग रहे थे उन्होंने सुकुल जी के कान में कहा –


लेकिन कितनी भी उदासीनता क्यों न हो ,उम्मीद हमेशा कायम रहती है। स्थितियां बदलेंगी।सत्य का आभास कभी न कभी इंसानी मन में जागरूकता लाएगा।सही और ग़लत में से सही को पहचानने की शक्ति बलवती होगी ।ऐसी ही ओजस्वी लेखनी है आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव की।आइए उनकी रचना का आनंद उठाएं -

तब तक

हमारे हृदय की तरह  
गंगा के तट 
और सिकुड़ चुके होंगे...
और प्रौढ़ पीढ़ी के लोग  
शर्म से निरुत्तर 
नज़रें झुकाए खड़े होंगे। 


आज के मेरे और पसंदीदा लिंक आदरणीय ज्योति खरे जी की रचना 'शरद का चांद' पुनर्मिलन की आशा मन में संजोए हैं ।वह भी खामोशी को तोड़ने की बात कह रहें हैं -



ख़ामोशी तोड़ो
सजधज के बाहर निकलो
उसी नुक्कड़ पर मिलो
जहाँ कभी बोऐ थे हमने
चांदनी रात में
आँखों से रिश्ते 



आँखों का क्या करें,बनी ही हैं ये गुलाबी सपने देखने के लिए।सपने कभी सपने न रहें, साकार हों जाएं ।ऐसी ही सुन्दर भावना से ओतप्रोत है यह रचना। आदरणीया मुदिता जी के ब्लॉग से

मूँदते ही पलक
खिल उठते हैं 
गुलाबी फूलों से सपने 
मदिर मधुर एहसास 
होने का तेरे
उतर आता है




अगली रचना 'आइने का सच' हमें सत्य से रूबरू कराती है।हम खुद से झूठ बोलें और लोगों से झूठ बोलें,पर आईना झूठ नहीं बोलता।यह हमें हमारी वास्तविकता से परिचित कराता है । आदरणीय पुरुषोत्तम जी की रचना से ऐसे ही भाव प्रकट हो रहे हैं-


 -सच ही कहता था आईना....
करीब होकर भी, कितना वो अंजाना!

हो पास, जैसे कोई परछाईं,
किरण कोई, छांव लेकर हो आई,
छुईमुई, छूते ही सरमाई,
अपनत्व ये, सच सा लगे कितना,
सच ही कहता था आईना....
कितना वो अंजाना!

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 त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।
आपकी
- अभिलाषा चौहान 

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