नमस्कार ! जहाँ त्योहार उल्लास लाते हैं वहीँ अचानक से किसी का आना भी उत्सव की तरह होता है ...... और ऐसे आने वालों को अतिथि की श्रेणी में रखा जा सकता है .......वैसे आज कल अचानक दुःख के सिवाय और कोई नहीं आता ....... और ये दुःख ऐसे अतिथि होते हैं जिनको जल्दी से जल्दी ही भगाने के प्रयास किये जाते हैं ........या फिर ऐसे समय स्वयं से ही संवाद कर खुद में ख़ुशी ढूँढने का प्रयास किया जाता है ....... शायद कुछ ऐसे ....
जाने कैसे रूप बदल कर
पाल वधिक हो जाता है
स्वार्थ जहाँ पर शीश उठाता
हाथ-हाथ को खाता है
ज्यों - ज्यों हम बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे ही हम जीवन को अलग दृष्टिकोण से देखने लगते हैं ....... लेकिन बचपन में न तो ऐसे अनुभव होते हैं और न ही अगर और मगर की बात ..... ऐसे ही पढ़िए एक सोच .....
मगर ये सब बातें ,अहसास 70के दशक से 21वीं सदी की शुरुआत की बातें हैं.आज के दौर में ये बातें बेमानी हैं .पैसे की कीमत दिनोंदिन महत्वहीन हुई है. जो चीजें होश संभालने के बाद की बातें थी ;क़क्षा में अव्वल आने की खुशी की थी वे सब आज स्टेटस सिम्बल बन गई हैं घड़ी पहनने के लिये कक्षा मे अव्वल आना अनिवार्य नही रह गया है.
बचपन की बातों से निकल आगे की ज़िन्दगी के बारे में सोचें तो लगता है कि वक़्त कितना बदल जाता है ..........
आस हैं और भी.....राह हैं और भी....
कहा ...दिल ने कुछ तड़प कर
जो चाहा था ,वही तो पाया..!!
वक्त ने कहा मुस्करा कर...
कहाँ परिणाम तुम्हे समझ में आया?
अब आप ही बताइए भला ऐसे में कोई इनके साथ ज़्यादा देर तक तो नहीं बैठ सकता न.. मैं बाबा के काम कर दूँगा पर उनके साथ बैठना मुझसे न होगा न ।”
“हाँ दादी के तो मैं सारे काम भी कर दूँगा, बैठूँगा उनके पास, बात भी करूँगा, पैर तो मैं उनके दबाता ही हूँ जब वो कहती हैं ।”
जहाँ एक ओर व्यवहार दूसरों को आकर्षित करता है वहीँ अनुशासन ज़िन्दगी को नए आयाम देता है ....... अब इसे सज्जनता कहें या कर्तव्य .... आप ही निर्णय करें .....
वीरानी के सन्नाटे को चीरती हुई झींगुरों की आवाज़ वातावरण में दहशत पैदा कर रही थी, किन्तु इस सब से अभ्यस्त रामपाल चौकन्नी निगाहों से दायें, बायें देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। सहसा वह कदम रोक कर अपनी जगह रुक गया। उसे दूर वृक्षों के झुरमुट के मध्य से आती हल्की-सी कुछ आहट सुनाई दी। सधे कदमों से वह आहट की दिशा में कुछ आगे बढ़ा। रौशनी मद्धम हो चुकी थी, किन्तु उसकी गिद्ध-दृष्टि ने एक साये को लगभग पचास मीटर की दूरी पर रेंग कर चौकी की तरफ बढ़ते पाया। वृक्षों की आड़ ले कर वह तेज़ी से, लेकिन सतर्कतापूर्वक साये की दिशा से हट कर कुछ आगे तक गया। कुछ ही मिनट में वह साये के दस फीट पीछे पहुँच चुका था।
इस कहानी के साथ ही आज की हलचल यहीं समाप्त करती हूँ ........ यूँ हलचल तो आप लोगों के आने से और अपने विचार प्रगट करने से होगी ..... अब देखना है की आप सब पाठक कितनी हलचल प्रस्तुत करते हैं ....... सन्नाटा तो न होगा न ?
प्रतीक्षा रहेगी आपके सुझावों की ......
नमस्कार .
संगीता स्वरुप