सादर अभिवादन.....
वो पांच दिन ऐसे जगह गए
जहाँ घर के अंदर कोई नेटवर्क नहीं
अगर है तो वह भी डेढ़ किलोमीटर दूर
कल ही लौटे हैं राहत मिली..चलिए जो है सो
प्रारब्ध था भोग लिए..
आज की रचनाओं पर एक नज़र..
एक ऐसा ब्लॉग से जहा मैं कभी नहीं गई
क्या तुम्हें याद नहीं था
मेरा नाम, मेरा धर्म
या किस जगह से मेरा ताल्लुक है तुम ये भूल गए थे
नहीं ऐसा तो कुछ नहीं था
जब हम मिले थे, तुम जानते थे
पल मे छूटा बरसों का
साथ, एक पंक्ति में
हमने मुक्कमल कर दी
मुलाकात, एक पंक्ति में
मॉर्डन लव का ये एपिसोड एक प्यारी प्रेम कहानी के साथ लॉकडाउन की यादे भी ताजा कर देती हैं | बिलकुल फ्लैशबैक में ले गया जैसे | कैसे सुनसान सड़के होती थी , कैसे लॉकडाउन पर सब घर भाग रहें थे , कैसे इस खाली समय को सब इधर उधर के काम करके बिता रहें थे तो कैसे बहुत से लोगों के लिए घर जेल बन गया था | जहाँ 2020 का लॉकडाउन डर के बीच मजेदार गुजरा तो 2021 ने डर और दहशत ने सभी को अंदर से झंकझोर दिया ।
शून्य जगती तल है सारा
तृष्णा में बंध मारा-मारा
रेत के सागर में मीठे
जल की आस मे दौड़ता है
मन विहग कब बोलता है
वैसे सच बतायें तो अखबार में छ्प जाने से बड़े लेखक हो जाने की फील आ जाती है. जैसे की कोई सांसद सत्ता पक्ष का मंत्री बन गया हो वरना तो होते तो निर्दलीय सांसद भी हैं. हैं भी कि नहीं कोई जान ही नहीं पाता. मगर फिर भी निर्दलीय के सांसद होने और अनछपे के लेखक होने से इंकार तो नहीं ही किया जा सकता है
बेवस
मजबूर और
असहाय नहीं तुम
खुद को
पाओ।
एकरा के खूब निहरले रहनी दूगो नैनन से
आपन ख्वाहिश के सच बन जाए खातिर।
जब टूट जाला सारा तारा इश्क के,
आवेला जुगनू रात में तारा बन जाए खातिर।
मंजिल पर पहुँच कर ये राहें लौटती नहीं
तू भी ख्वाबों से दिल को लगाना सीख ले
सच यही है तेरे हाथ में कभी कुछ न था
ये बात अपने दिल को समझाना सीख ले
.....
आज बस
सादर






