मातृदिवस पर अशेष शुभकामनाएं
सादर
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अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।
नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।'
अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।
माँ जीवन की नाभि में भरा ममत्व का अमृत रस जो जीवन की कड़ुवाहटों को संतुलित करती है।
आइये आज की विशेष रचनाएँ पढ़ते हैं-
माँ अब समझीं हूँ प्यार तुम्हारा
इल्लू और टिल्लू मजे में हैं। उनका एक बच्चा भी है और एक नया साथ भी। जो उन्हीं के साथ खाता-पीता और बग़ीचे में उनके पीछे-पीछे घूमता फिरता है। वह भले ही उनकी जात-बिरादरी का नहीं है, फिर भी वे उससे कोई द्वेष नहीं रखते हैं, मिल-जुलकर रहते हैं, जिसे देख मन को बड़ी ख़ुशी मिलती है कि चलो कहीं तो भेदभाव देखने को नहीं मिलता रहा है। अब आप सोच रहे होंगे की इल्लू-टिल्लू की जात-बिरादरी से दूर वाला ये तीसरा कौन है? यह है हमारा- 'गुटुरु' यानि कबूतर। यहीं उनका साथी है। इसकी भी एक अपनी अलग कहानी सुनते चलिए। कुछ दिन पहले जब वह बहुत छोटा था तो अपने माँ-बाप से बिछुड़कर वह पड़ोसियों के बगीचे में गिर पड़ा था,
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