जय मां हाटेशवरी......
“ मै किसी कर्मकाण्ड में विश्वास नही करती…
मै मुक्ति को नही ,
इस धूल को अधिक चाहती हूँ । ” ~महादेवी वर्मा
कल मेरी प्रिय कवियत्री व लेखिका.....
महादेवी वर्मा जी का जन्म दिवस था.....
.....शत-शत नमन.....
“ मैंने हँसी में कहा – ‘ तुम स्वर्ग मे कैसे रह सकोगे बाबा ! वहाँ तो न कोई तुम्हारे कूट पद और उलटवासियाँ समझेगा और न आल्हा-ऊदल की कथा सुनेगा ।
स्वर्ग के गन्धर्व और अप्सराओ मे तुम कुछ न जँचोगे । ’
ठकुरी बाबा का मन प्रसन्न हो गया । कहने लगे – ‘ सो तो हम जानित है बिटिया !
हम उहां अस सोर मचाउब कि भगवानजी पुन धरती पै ढनकाय देहै! हम फिर धान रोपब ,
कियारी बनाउब , चिकारा बजाउब और तुम पचै का आल्हा-ऊदल की कथा सुनाउब ।
सरग हमका ना चही , मुदा हम दूसर नवा शरीर मांगै बरे जाब जरूर । ई ससुर तौ बनाय कै जरजर हुइग ’– और वे गा उठे : चलत प्रान काया काहे रोई राम । ” ~महादेवी वर्मा
एक दिन सब ऐश्वर्य, सम्पदा, तेरा-मेरा
यहीं तो छूट जाएंगे, निशानियाँ रह जाएंगी
और...हाथ छूट जाएंगे
बस एक ही आशा,एक ही प्रार्थना
अपनों को काँपते कलेजे से भींच
हाथ बाँध,आसमान पर टिकी हैं आँखें
बेसुध से होंठ बुदबुदाते हैं-
सर्वे भवन्तु सुखिन:,सर्वे सन्तु निरामया ...
असली कंगन पहन के ,महिला करती सैर ।
वहाँ लुटेरे मिल गये ....कंगन की नहि खैर ।।
कंगन की नहि खैर ,सभी देखते तमाशा ।
छीना झपटी मार,नहीं स्त्री छोड़ी आशा ।।
धरती पर सुख को जीने के लिए आये हैं, यह आनंद किसी नौकरी, व्यापार या अन्य तरीके से नही मिलने वाला बल्कि यह तो जग व्याप्त है, सहज मिलने वाला है निर्भर आपकी
पात्रता करती है आप कितने सुख के हिस्से को छू पाते हैं।
माँ बन जाऊँगी
पत्नी कहलाऊँगी
बेटी, बहन
तो बन बन
के थक गई थी बहुत पहले
बहू, भाभी,चाची, मासी कोई कुछ भी कह ले
पर मैं हूँ, कहीं क्या ?
ढूँढती रही सदा
करती रही अपनी तलाश
खो दिया होशोहवास
बहुत कुछ बन के
बन ठन के
‘उलूक’ का तो
रोज का यही काम रह जाता है
रोज शुरु करता है अपनी यात्रा
रोज जाता है मछलियां देखता है
और वापिस भी आ जाता है
रेल के कुछ डब्बों को आगे पीछे करता हुआ
दूसरे दिन के लिये एक रेल बनाता है
ऐसे में कोई कैसे उम्मीद करता है
कुछ नया खुद का बनाया हुआ
रेल का एक डब्बा ही सही
कोई क्यों नहीं किसी को दिखाता है ।
सवाल सिस्टम और व्यवस्था का जब बेमानी हो जाता है
आज बस इतना ही.....
अब मुलाकात होती रहेगी....
धन्यवाद।
