शीर्षक पंक्ति: आदरणीया आशालता सक्सेना जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक के साथ पाँच रचनाएँ लेकर हाज़िर हूँ-
लीजिए पढ़िए आज की पसंदीदा रचनाएँ-
कभी मन में बेचैनी होती
इतना इन्तजार किस लिए
कब तक राह देखी जाए
नव वर्ष जल्दी से क्यूँ न आए।
लाज-शर्म रो घूँघट काड्या
फिर-फिर निरख अपणों रूप।
लेय बलाएँ घूमर घाले
जाड़ घणा री उजळी धूप
मोर जड़ो है नथली लड़ियाँ
प्रीत हरी बुनियाद रही।।
बृजवासिन को चैन चुरावे,
गाए-गाए गुण ग्वाल सब झूमे,
ग्वालिन भोग ख्वावे रे,
धेनु उड़ावे धूरी घन-घन पर,
सुरवर बहुत पछतावे रे,
जाँच-परखकर रिश्ता ढूँढा है न तुमने उसके लिए।अपने चयन और अपनी परवरिश पर भरोसा रखो !और थोड़ा संयम रखो ! बाकी सब परमात्मा की मर्जी"। कहकर वह अन्दर आ गयी।
थोड़ी देर बाद निक्की का फोन आया तो सुरेश ने माँ के सामने आकर ही फोन उठाया और बोला, "कोई बात नहीं बेटा ! आज नहीं आ सकते तो कोई नहीं जब समय मिले तब आना, हाँ अपनी सासूमाँ और बाकी घर वालों से राय मशबरा करके । ठीक है बेटा! अपना ख्याल रखना"।सुनकर सरला ने संतोष की साँस ली ।
गुनगुनाते हुए और मस्ती में गोयल सा ने गाड़ी स्टार्ट की और फटाक से रिवर्स गियर लगाया. तेजी से स्टीयरिंग घुमाते हुए कार बैक की. पीछे से धम्म की आवाज़ आई. श्रीमती चौंकी - संभाल के ! क्या कर रहे हो ? उतर कर पीछे देखो.
गोयल साब ने उतर कर देख दो गमले ढेर हो गए हैं. आकर बैठ गए और बोले - अरे यार गमले गिर गए कोई ऐसी बात नहीं. फ़िकरनॉट होता रहता है ये तो, और तेज़ी से गाड़ी गेट की तरफ भगा दी.
कार के पीछे पीछे गार्ड दौड़ता आ रहा था - हेलो रोको रोको ! पर गोयल सा को आगे देखना जरूरी था या पीछे ?