शीर्षक पंक्ति:
आदरणीय दिगंबर नासवा
जी की रचना
से।
सादर
अभिवादन।
रविवारीय अंक
लेकर हाज़िर हूँ।
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
हमें जो उम्र अता की गयी थी जीने को
वो हमने जान बचाने में खर्च कर डाली
सैयद सरोश आसिफ़
एक वोटर की आपबीती -
हमें जो वोट का हक़ था मिला व्यवस्था से
वो हमने चोर-लुटेरों पे खर्च कर डाला
हो न तलवार तो हम ढाल में ढाले जाते ...
दीप जले मन आँगन।
बिन बारिश के बरसा है कब
प्रेम भरा यह सावन।
आस मिलन की राह देखती
छोड़ रही तरुणाई।
तारों के....
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे आगामी गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव