सादर अभिवादन
स्वतंत्र आवाज , जी हाँ
पहले तो में अचकचा गई
इस ब्लॉग का नाम पढ़कर
चक्रव्यूह में घुसकर महारथियों
घुटने को मज़बूर करने वाले
अभिमन्यु सी प्रकृति है इस ब्लॉग की भी
लेखन में विविधता और
सारगर्भित रचनाओं का संग्रह
अवसाद से जीतकर
उसकी कलम ने उगली
आक्रामक रचनाएँ...
साधुवाद मनीषा को...
आभार
पता तो सबको है,
कि जिंदगी की मंजिल मौत है !
फिर भी मौत के नाम से
आंखें नम हो जाती हैं!

लोल लहरें मंद स्वर
के साथ कर रहीं थीं!
नृत्य का अभ्यास!
निरवता को तोड़ते हुए,
जा रही थी जिसकी
दूर तक आवाज!
जिस्म को करके हवस के पुजारियों के हवाले,
खड़ी हो जाती है ,
एक कोने में जाके!
स्तब्ध सी निहारती रहती है ,
जिस्म को नोच रहें गिद्धों को,
और इक वैश्या के आगे बेनकाब होती शराफत को!
गाल गुलाबी होते उससे पहले
उसके हाथ पीले हो गए
उसकी आँखों में सुनहरे सपने पलने से पहले
टूट कर चकनाचूर हो गए
उसके भी थे कुछ सपने
पर नहीं समझ सके उसके अपने
मत दे ध्यान इन बातों पर,
कि कौन हंस रहा तुझ पर!
छूना है हर ऊंचाइयों को,
ये काबिलियत है तुझ में!
क्यों? भागता है, इन मामूली चिंगारियों से
अभी तो सुलगते अंगारों पर चलना है तुझे!
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आभार मनीषा
इन सुन्दर रचनाओं के लिए
सादर
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आभार मनीषा
इन सुन्दर रचनाओं के लिए
सादर



