अभी मुठ्ठी नहीं खोली है मैंने, आसमां सुन ले।
तेरा बस वक़्त आया है, मेरा तो दौर आएगा।।
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है।
जिस तरफ़ भी चल पड़ेगे, रास्ता हो जाएगा।।
@हरिवंश राय बच्चन
हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...
आप जब 'अपने-अपने आग्रह', 'अपने-अपने सुकून', 'आदाब', 'पाकिस्तान', 'कुर्बानी', 'मज़हब', 'मजहबी किताबें' आदि पढ़ेंगे तो चाहे मेरे कितने ही विरोधी हों, कम से कम अंतर्मन से मेरे पक्षधर हो जाएँगे। कह सकता हूँ कि यह किताब अपने समय की ताज़ातरीन राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक आदि विसंगतियों को समझने की एक पाठशाला - जैसी है।
हम उन्हें देखकर सोच भी ना सके
कि हम जमीन थे, तो वह आसमान थे
शायद नजर थी हमारी उन पर
बनाना चाहते थे उनको हम सफर
मगर उन्हें अपना बना ना सके।।
ध्रुव नहीं मैं
किंचित उसकी ही तरह
उस आसमां पर
चमकने की चाह में
सफलता की सीढियां
चढ़ने की
कोशिश में
आगे बढ़ रहा हूँ मैं
किसी दिन खुद में तलाश करता हूं,
किसी दिन इन दरारें भरी पहाड़ों से
उबड़-खाबड़ रास्तों से
उस गंतव्य के अंतिम तक तलाश करता हूं,
सोचता हूं कोई दे जाए मुझे,
हवाएं जब चलती हैं तो महसूस करने की कोशिश रहती हैं
शायद महसूस हो जाए मुझे,
सब्र कर तू कभी गम ना कर
झोपड़ी से महल यदि है तुझको बनाना
तो कोशिश को अपने कभी कम ना कर
बड़ा चल बड़ा चल तू हर क्षण बढ़ा चल
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पुन: भेंट की आस...
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