सादर अभिवादन...
हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं
आज हिंदी को पहले की भांति वैश्विक धरातल प्राप्त हो रहा है। विश्व के कई देशों में हिंदी के प्रति आकर्षण का आत्मीय भाव संचरित हुआ है। वे भारत के बारे में गहराई से अध्ययन करना चाह रहे हैं। विश्व के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में हिंदी के पाठ्यक्रम संचालित किए जाने लगे हैं। इतना ही नहीं आज विश्व के कई देशों में हिंदी के संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। अमेरिका में एक साप्ताहिक समाचार पत्र उल्लेखनीय ख्याति प्राप्त कर चुका है। हिंदी संचेतना नामक पत्रिका भी विदेश से प्रकाशित होने वाली प्रमुख पत्रिका के तौर पर स्थापित हो चुकी है। ऐसे और भी प्रकाशन हैं, जो वैश्विक स्तर पर हिंदी की समृद्धि का प्रकाश फैला रहे है। भारत के साथ ही सूरीनाम फिजी, त्रिनिदाद, गुआना, मॉरीशस, थाईलैंड व सिंगापुर इन 7 देशों में भी हिंदी वहां की राजभाषा या सह राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इतना ही नहीं आबूधाबी में भी हिंदी को तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता मिल चुकी है। आज विश्व के लगभग 44 ऐसे देश हैं, जहां हिंदी बोलने का प्रचलन बढ़ रहा है। सवाल यह है कि जब हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब हम अंग्रेजी के पीछे क्यों भाग रहे हैं। हम अपने आपको भुलाने की दिशा में कदम क्यों बढ़ा रहे हैं। हिंदी के सहारे ही हमारी वैश्विक पहचान है। हम हिंदी को अपनाएं, अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। यही हमारा स्वत्व है और यही हमारी संस्कृति है।
हिन्दी भाषा किसी प्रमाण की मोहताज नहीं हिन्दी भाषा के प्रति भारतीयों के मन में श्रद्धा और सम्मान प्रेरित करने के लिए 14 सितंबर 1949 से हिंदी दिवस मनाए जाने की शुरुआत की गई है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हिंदी के लिए अपनों से ही ऐसे सम्मान को पाए जाने की आवश्यकता महसूस क्यों होती है। इसका कारण सीधे देखा जाए तो एक मुहावरे में मिल जाएगा कि घर की मुर्गी दाल बराबर।

संस्कृत है मेरी जननी
मै हूं उसकी प्यारी भगिनी
मैं दिलों में सबके रहती हूं
मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी....

1) मौत संवेदना की ....
असल में विशाल मॉल के बाहर लगे सीसीटीवी फ़ुटेज ने मुझे बचा लिया. उसमें साफ़ दीख रहा था कि नीले रंग की एक कार उस वृद्ध को रौंदते हुए तेज़ी से निकल भागी. बाद में मेरी कार रुकी और उनको साथ लेकर फिर बढ़ी...'
'यह तो वाक़ई इनसाफ़ का काम हो गया. निर्दोष को बचाने वाले आ ही जाते हैं.'
2) परिणति ....
एसएमएस आने से पहले मैं खाना खा चुका था. पलकों में भरी-भरी नींद उड़ चुकी थी. मैंने पत्नी से यह दुखद समाचार बताया- लगभग टूटे हुए स्वर में और बेडरूम में चला गया.
थोड़ी देर बाद पत्नी पास में आकर लेट गयी. मैं करवटें बदल रहा था. उसने मेरी बेचैनी को भांप लिया. मेरे क़रीब आकर उसने मेरे बालों में उंगलियां फिरायीं. मैं उसके और नज़दीक सरक गया. वह मुझे सहला रही थी. मैंने उसकी छातियों के मध्य अपना सर छिपा लिया.

अक़्सर ..
जब कभी भी
चढ़ते देखा है कहीं
मंदिर की सीढ़ियों पर यदि
किसी को भी तो अनायास ही।
आ जाते हैं याद मुझे ग़ालिब जी -
"हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।" .. बस यूँ ही ...

मुझे आश्चर्य हुआ कि हम दिन-रात बस की सीट के लिए लड़ते हैं और ये सीट मिलती है और दूसरे को दे देती है। कुछ देर बाद वो बुजुर्ग भी अपने स्टॉप पर उजर गए, तब वो सीट पर बैठी। मुझसे रहा नहीं गया, तो उससे पूछ बैठी, ‘तुम्हें तो सीट मिल गई थी एक या दो बार नहीं, बल्कि तीन बार, फिर भी तुमने सीट क्यों छोड़ी? तुम दिन भर ईंट-गारा ढोती हो, आराम की जरूरत तो तुम्हें भी होगी, फिर क्यों नहीं बैठी ?’

बचपन की यादों से जिसने
समझौता कर डाला
और तुम्हारे ही सपनों को
सर आँखों रख पाला
पर उसके अपने ही मन से
उसको मिलने दोगे ?
तुम उसके जज्बातों की
भी कद्र कभी करोगे ?

