नमस्कार , गणपति बहुत लोगों के घर में पधार चुके हैं ..... हम भी यहाँ ॐ गणपतये नमः 🙏🙏 कर आज के लिंक्स आप तक पहुँचाने का श्री गणेश करते हैं । कल हिंदी दिवस है । 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था । राष्ट्र भाषा के रूप में अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है । हिंदी का प्रचार - प्रसार केवल दिवस , सप्ताह या पखवाड़ा मना कर नहीं किया जा सकता । इस दिन सरकार के संस्थानों में कुछ प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं ऐसे ही विद्यालयों में बहुत से कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं ,मात्र यह प्रयास काफी नहीं हैं । जन जन की भाषा बनाने के लिए आवश्यक है कि हम नौकरियों को प्राप्त करने के लिए हिंदी को प्राथमिकता दें । जब भाषा जीविकोपार्जन से जुड़ेगी तो स्वयं ही उसका उत्थान हो जाएगा ।
खैर जितना विशाल देश उतनी ही ज्यादा समस्याएँ ...... एक को छोड़ते हैं तो दूसरी सामने खड़ी दिखती है ....... कवि और शायर भी कुछ भ्रमित से हो गए हैं । पहले सुनते थे कि शायरी गम ऐ इश्क का दरिया है जिसमे लोग डूब जाते हैं । लेकिन आज कल शायरी का विषय भी बदल गया है ......ज़रा मुलाहिज़ा फरमाइए
अरुण निगम जी को चिंता है गाँव की शहर की ---
शहरों में नजर आती है खूब धनी बस्ती
गाँवों में मगर क्यों है अश्कों से सनी बस्ती।
ये चिंता खाली गाँव और शहर की नहीं ..... किसी एक देश की नहीं ....... कवि हृदय तो न जाने क्या क्या सोचता है और जो देखता है उसे शब्दों में ढालने का प्रयास करता है ..…. इसी संदर्भ में पढ़िए पेरू की चर्चित कवयित्री विक्टोरिया ग्युरेरो की कविता का अनुवाद जो अरुण चंद्र राय जी द्वारा किया गया है ........----
क्या वाकई कोई कविता इन प्रश्नों को उठा पाएगी ? जीवन में जहां सामाजिक सरोकार हैं वहाँ कुछ नितांत निजी सरोकार भी हो सकते हैं ....... वो भी किसी कवि की दृष्टि से छुपते नहीं हैं ,मन में न जाने कितनी आस लगाए बैठते हैं , कुछ ऐसे ही भावों को उजागर किया है रेखा श्रीवास्तव जी ने ----
आस लिए बैठे हैं !
वक्त गुजरता जा रहा है तूफान की तरह तेजी से ,
हम पोटली थामे यादों की आज भी लिए बैठे हैं ।
अब आशा का क्या भला , हमारी उम्मीदें इतनी हो जाती हैं कि हमें बहुत बार सही गलत भी नज़र नहीं आता । अपनी ही धुन में न कुछ सोच पाते न ही देख पाते ..... ऐसा ही कुछ पढ़ा रही हैं प्रतिभा सक्सेना जी ..... लेकिन एक शर्त के साथ ------
वैसे सच ही न जाने ज़िन्दगी में क्या क्या छुपाना पड़ जाता है ...
कुछ लोगों की नज़र बचा कर तो कुछ बिंदास करते हैं प्यार , लेकिन अमृता तन्मय जी खूब मिर्च मसालों का तड़का ले कर आई हैं कि यदि ये सब नहीं तो फिर -------
वो प्रेम ही क्या
जो दूसरों के मनोरंजन के लिए
खेल वाला गुड्डा-गुड्डी बनकर
सबको खुश कर जाए
फिर अपने बीच होते
पारंपरिक खटरागी खटर-पटर से
सबों को मिर्च-मसाला दे कर
खूब तालियां बजवाए
लीजिए साहब प्रेम की तो बतकहियाँ खूब होती हैं लेकिन हमारे बुद्धिजीवी लोग भी कम नहीं कुछ कहने में ....... अब जावेद जी को कौन नहीं जानता ? जी हाँ जावेद अख्तर जी ...... कभी कभी बेतुके बयान दे बैठते हैं और हमारे वोकल बाबा छोड़ते नहीं उनको --
जबान संभाल के श्रीमान, संघ नहीं है तालिबान!
राजनीति में बहुत कुछ कहा-सुना जाता है। राजनेता और उनके समर्थक एक तरह से मानकर चलते है कि लोकतंत्र में उन्हें कुछ भी कहने- करने का अधिकार है । इसके साथ ही लोगों को गुमराह करने और फेक नैरेटिव के निर्माण का विशेषाधिकार भी उन्हें प्राप्त है। मेरी पार्टी को छोड़कर बाकी सारी पार्टियाँ बेकार हैं जैसा विचार रखना और उसका बचाव करना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है। राजनेताओं और उनके समर्थकों की इसी खुशफहमी के चलते हमें उनकी अच्छी के साथ-साथ बकवास बातें भी लगातार सुनने को मिलती हैं और सुनने को मिलते हैं जरूरत से ज्यादा ग़ैर जिम्मेदाराना बयान। तमाम सिलेब्रिटी यानी जाने-पहचाने या पब्लिक फिगर भी बेतुके बयान देने से नहीं चूकते है। ऐसे ही चंद बयानों के पोस्टमॉर्टम पर ये लेख आधारित है। लेकिन पहले उस घटना का जिक्र करना ज़रूरी है जिसके सन्दर्भ में बहुत से बेतुके बयान दिए गए हैं या दिए जा रहे हैं।
चलिए हो गयी बहुत बयानबाजी ........ उम्मीद है आज के लिंक्स का आप सब ही भर पूर आनंद उठाएंगे ..... अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराइएगा .....
चलते चलते -----
एक बहुत संवेदनशील रचना ...... अफगान में होने वाले क्रूरतम व्यवहार पर एक भावपूर्ण सशक्त कविता ..
(अफगानिस्तान के वर्तमान हालात पर एक व्याकुल
कविता) गिरीश पंकज जी ....
फिर मिलते हैं अगले सोमवार इसी समय , इसी मंच पर ..... तब तक के लिए ब्लोगिंग कीजिये ...... टिप्पणियाँ दीजिये .....................
नमस्कार
संगीता स्वरुप ...
