सादर अभिवादन
उपवास है आज
सोचे प्रस्तुति सुबह-सुबह ही बना देते हैं
पर आज अभी तक बनाते हुए
अपने आपको बहलाए हुए हैं
पर आज अभी तक बनाते हुए
अपने आपको बहलाए हुए हैं

आँखों में कोई ख़्वाब सुहाना नहीं आता ।
बदनीयत हो गयी सारी दुनिया ही जैसे
किसी को भी एहसास निभाना नहीं आता ।
मैंने जब-जब मेरे शिवा को अपने हाथों से मिट्टी के गणेश की प्रतिमाओं की आकार देते देखा है तब-तब मैंने अनुभव किया कि पीओपी की तुलना में मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने में कठिन परिश्रम और समय की आवश्यकता तो पड़ती ही है,
साथ ही साथ उसके धैर्य की भी परीक्षा होती है।
आज बस .. अब .. कल के वादानुसार आइए .. कुछ भी कहते-सुनते (लिखते-पढ़ते) नहीं हैं .. बल्कि हम मिलकर देखते हैं .. मुंशी प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी- कफ़न पर आधारित एक लघु फ़िल्म .. हम प्रशिक्षुओं का एक प्रयास भर .. इस "ना 'सिरचन' मरा, ना मरी है 'बुधिया' ... -(भाग-४)." - अंतिम भाग में .. बस यूँ ही ...

एक दिन
एक ऊँचा सा पहाड़ मुझसे बोला
ऊँचाई देखती हो मेरी
कभी देखा है
जमीं में मैं कितना धँसा हुआ
शायद इस ऊँचाई से भी अधिक
मैं स्तब्ध थी
समस्या धरती की है निदान भी यहीं है,
जाने बिना ऐसे मत अनंत में कूद पड़ों।
जलजला संभालने वाले भतेरे हैं इर्द गिर्द,
मत खुद को असहाय समझ छूट पड़ो।
जिसकी सुबहें
सोने जैसी
दिन रजत ,ताम्र संध्याएँ हैं,
जिसके हिमगिरि
नभ,चाँद सुभग
वेदों संग परीकथाएँ हैं,
जिसके सागर में
रत्न सभी
जिसका हर उपवन नन्दन है।
वे रीछ और वानर युग के
दिखते आदिम मानव जैसे
वनचर भी उनसे डरे हुए
पीते अपनों का लहू ऐसे
वे मानुष हैं या नर पिशाच
मनु की पहचान ही गौण हुई

क्या
जानें
आओगे
भुलाओगे
कौन बताये
किस्मत हमारी
फितरत तुम्हारी !

जैसे, रुक सी रही हो, इक नदी,
चीख कर, खामोश सी हो, इक सदी,
ठहर सा रहा हो, वक्त का दरिया,
गहराता सा, एक संशय,
इक-इक पल, लिए कितने आशय,
पर, संग, बड़े बेखबर से हम,
और, गुम से तुम!
चीख कर, खामोश सी हो, इक सदी,
ठहर सा रहा हो, वक्त का दरिया,
गहराता सा, एक संशय,
इक-इक पल, लिए कितने आशय,
पर, संग, बड़े बेखबर से हम,
और, गुम से तुम!
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गणेश पर्व की शुभ कामनाएँ..
आज के लिए बस इतना ही
कल मिलिएगा बड़ी दीदी से
सादर
गणेश पर्व की शुभ कामनाएँ..
आज के लिए बस इतना ही
कल मिलिएगा बड़ी दीदी से
सादर



