सादर अभिवादन
भाई कुलदीप प्रशिक्षण प्राप्त करने
मुख्यालय गए हैं
आज की पढ़ी रचनाओं से चुनिन्दा सूत्र...
आज की पढ़ी रचनाओं से चुनिन्दा सूत्र...
मैं प्रेम अगन के बीज खेत में नहीं उगाती
मन्दिर-मस्जिद के झगड़े को संस्कार बना देखो
अपने पुरखों के जीवन इतिहास उठा देखो
कर्तव्य पथ पर बढ़ते कदमों को मत रोको
देशप्रेम के बढ़ते पथ पर मत टोको
ये
शूल
बबूल
दंभ मूल
विषाक्त चूल
निकृष्ट उसूल
चीर-चीर दुकूल
न
देखे
कहीं भा
दिशाहीन
यश का लोभ
भ्रम में पड़ा है
अधर में खड़ा है
मुसाफिर हूँ तो मैं सेहरा का, लेकिन
चमन का रास्ता भी जानता हूँ
ये दुनिया सिर्फ खारों से ख़फ़ा है
मैं फूलों की खता भी जानता हूँ
गीत संगीत की बातें हों और मन हिरन सा कुलाँचे भरता हुआ बचपन की वादियों में ना पहुँच जाए यह तो हो ही नहीं सकता ! हमारा बचपन ! बेहद प्यारा और न्यारा बचपन ! वह बचपन जब आसमान के सितारों को गाने सुनाने की होड़ में सुर कभी तार सप्तक से नीचे उतरते ही नहीं थे और सुबह की पहली किरण के साथ गीत संगीत के साथ जो तारतम्य जुड़ता था वह रात को निढाल हो नींद के आगोश में लुढ़कने के बाद ही टूटता था !
और अंत में मैं मंजू दीदी की रचना साझा कर रही हूँ..
मुट्ठी भर सपने
दो चार अपने
ख़ुशी के चार पल
तुम्हारी याद नहीं, तुम
बस.…
जिंदगी से
इतना ही तो माँगा था
क्या ये बहुत ज्यादा था !!!
आज्ञा दें...
भाई विरम सिंह आ गए हैं
शायद कल की प्रस्तुति वे दें
सादर
सादर
यशोदा...




