सादर अभिवादन
जाएगा मई आज
बचे हुए सात महीनें मे
और कितने आँसूं बहाने पड़ेंगे
यही सोच रही हूँ मैं....
होइहैं वही जो राम रचि राखा
आइए रचनाएँ देखें...
[शनिवार फरवरी 2021 को प्रकाशित उनकी अंतिम कविता ]
सहेजते रहे ताड़पत्र गठरियाँ भर
कि रचेंगे छन्द कभी ठठरियाँ कर
जिस देह न वसन, न बसेरा है।

यदि कोई एक कविता ही किसी भी बालमन को सुधारने, बिगाड़ने का काम करती तो ऐसे लोगों से ही पूछना चाहिए कि उनके अपने समय में पढ़ाई जाने वाली कविताओं को रटने के बाद भी उन्हीं के कालखंड के पुरुष माँ-बहिन की गालियाँ क्यों देते नजर आते हैं? दो-चार शब्दों के सहारे बालमन पर गलत असर पड़ने वालों को ध्यान रखना चाहिए

इस कविता के पास
पांच उंगलियां और है एक अंगूठा
जिससे बन सकती है
तर्जनी भी और मुट्ठी भी
यह कविता
सिखा सकती है जीना
और आवाज़ उठाना

उड़ते बन पखेरू,
मन पखेरू
विभास के संग ,
शब्द प्रचय से संचित,
मुतियन बुँदियन भीग रहा मन
प्राची का प्रचेतित रंग ,

तुम पढ़ जाती हो
एक पल में
हजारों बार
और में
जी लेता हूँ
तुम्हें
शब्दों के पार...।
.....
.....
बस आज यहीं तक
सादर
सादर