सादर अभिवादन।
गुरुवारीय अंक में आपका स्वागत है।
दोषारोपण
और
नाकामी का
दौर
अब तीखा हो चला है,
सावधान रहिए
करोना का ख़तरा
अभी नहीं टला है।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
शाम ढलने लगी है... आशालता सक्सेना
स्वप्न में यह आकांक्षा भी
पूर्ण हो मेरे मन की
मैं सो जाऊँ सुख निंदिया में
खो जाऊँ सपनों में
कुछ ऐसी गुज़री हम पर...साधना वैद
३० अप्रेल को हमारे सेल्फ क्वारेंटीन की अवधि समाप्त हुई ! काफी दवाएं भी उस दिन तक समाप्त हो गयीं थीं ! एक मई को हमने सारे घर को मेड की सहायता से सेनीटाइज़ किया ! खिड़की, दरवाज़े, कुंडी, चटकनियाँ सब अच्छी तरह से साफ़ करके सेनीटाइज़ करवाए ! परदे, चादरे, तौलिये, कवर्स सब चेंज किये और एक नॉर्मल दिनचर्या की ओर कदम बढ़ाया !
घुमड़ते बादलों को प्रेम का कातिब बना देना...दिगंबर नासवा
तलाशी दे तो दूं दिल की तुम्हारा नाम आये तो,
तुम्हें बदनाम करने का मुझे इलज़ाम ना देना.
दिलों के खेल में जो ज़िन्दगी को हार बैठे हैं,
उन्हें झूठी मुहब्बत का कभी मत झुनझुना देना.
सोते रहते सोने वाले,
कैसे बदलेंगे हालात।
आँखों पर सब पर्दा डाले
कब सुनते हैं मन की बात।।
भीड़ के पैरों में गहरे छाले हैं
आवाज़
के पैर हैं
वो
घुटने के बल
रेंग रही है
दरिया में
अगली सुबह तक...।
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव
