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गुरुवार, 5 मई 2016

293...उसे चाहिए चाँद दे दो अच्छा है

सादर अभिवादन स्वीकार करें
भाई संजय जी अभी तक नहीं दिखे...

सो अभी तक की पढ़ी रचनाओ में से चुनी हुई रचनाओं के अंश...

ऐ किसन अपने खिलौनन कूँ थिरकतौ कर दै।
नींद में खोये भये बिस्व में चाबी भर दै॥

लीप हर घर की जमीन अपनी इनायत सूँ किसन।
और छींकेन पै छब-छाछ की छछिया धर दै॥


मैं’ औ ‘तुम’ हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व, द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ ‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’ ||


जुटी भीड़ एक जलसे में 
एक समूह ने कुछ कहा 
चर्चा पर चर्चा हुई 
आनन् फानन में बात बढी


बहुत हुआ सर झुका के बंदन 
अब खोल सारे मन के  बंधन 
कुंठित था तेरा मन सदा  से 
अब तो सुलझा ये उलझे धागे

अपनी रफ़्तार दे गया है मुझे
जब कोई रहनुमा मिला है मुझे
वक़्त के साथ इस ज़माने में
हर कोई भागता मिला है मुझे

और अंत में आज की शीर्षक की कड़ी

बेटा या बेटी 
आंचल है आकाश 
दोनों के पास 

आज बस 
आज्ञा दें
यशोदा....






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