सादर अभिवादन
आज भाई कुलदीप जी नहीं हैं
शायद शहर से बाहर हैं
फिर भी समय को तो गुजरना ही है....
तुलना के खेल में
मत उलझो
क्योंकि
इस खेल का
कोई अंत नहीं....!
जहाँ तुलना
की शुरुआत होती है
वहीं से
खुशी और अपनापन
खत्म होता है.....!!
अब रचनाएँ......

काश इन हर्फों में आवाज होती
तुम अल्फ़ाजों की मेरे सदा सुन लेते
करें बेचैन यादें बीते लम्हों को याद कर
यही बेकरारी तुम भी अहसासों में गुन लेते
बिन तेरे कितना उचाट मेरे ज़िन्दगी का दायरा
तुम भी करके बंद आँखें मुझ सा ख़्वाब बुन लेते ।

कुछ ना करने से और तार उलझेगा ।
दम तोङेंगे सुर, राग बिखर जाएगा ।
कुछ करने से ही जीवन क्रम सुधरेगा ।
जो ग़लत राह चुनते हैं, उन्हें जाने दो ।
तुम अपने जीवन को तो सही दिशा दो ।

ख़ून में डूबी हुई वादी अकेली रह गई
ज़िन्दगी फिर मौत के लम्हे उठाने चल पड़ी
धूप, "वर्षा"-बादलों की भीड़ में खो कर कहीं
नाम गुमनामों की सूची में बढ़ाने चल पड़ी
मुस्काकर दो पल आंगन में ,
मौन दुपहरी के दामन् में ,
कोई कलिका जब खिलने से -
पहले ही मुरझा जायेगी |
याद न तब भूली जायेगी |

" माँ कहाँ खोई हो,पिज्जा आ गया "सोनाली ने आवाज़ दी तो मैं बीते दिनों से बाहर आ गयी। मैंने हँसते हुए डायलॉग चिपका दिया -" हमारी उम्र में पहली नज़र में ही पता चल जाता है कि लड़का-लड़की के बीच क्या चल रहा है "मगर,तुम आजकल के वेवकूफ बच्चे जिन्हे पेरेंट्स ने साथी चुनने की आज़ादी दे रखी है
....
बस
शायद कल दिव्या आएगी
सादर
....
बस
शायद कल दिव्या आएगी
सादर
