प्रेम की परिभाषा , प्रेम में ही निहित है
सपनों की जगह, नींद में निहित है
कोई हाथ पकड़ लें
कोई साथ चल लें
कोई कुछ कह दे
कोई कुछ कर ले....
इससे अलग जो भाव समझ ले
जो भाव को पढ़ ले
भाव को मन में रख ले
मन से मन को सुन ले, देख लें
प्रेम यही है
जीवन यही है.....
मानसी,
बस इतनी सी बात है
जो इन छोटी बातों को आत्मसाथ कर ले
वो प्रेम है, वो हम है. ...#श्रीविष्णु
कला हासिल किसी को है
मीठा विष पिलाने की,
किसी की बात में जादू
घात घातक सयाने सी
कोई समझे बिना ही बात
यूं ही बस लाल पीला है
अम्ब विमल मति दे॥
लव, कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम,
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे।
फेसबुक पर या अखबारों में, वो भी एक खास तबके के बीच या यूं कह लें
कि युवाओं में वो भी कस्बाई इलाकों की बनिस्बत शहरों व नगरों में ज्यादा है।
आखिर प्रेम सिर्फ युवाओं को ही करना चाहिए या
सबको यह सवाल भी मेरे जेहन में कई दिनों से कौंध रहा है।
17वीं शताब्दी में इंग्लैंड में एक परंपरा थी कि 14 फरवरी की सुबह कोई युवती जिस युवक को सबसे पहले देख लेती थी, वही युवक उस युवती का ’वैलेंटाइन’ बन जाता था। वैलेंटाइन एक व्यक्ति न रहकर प्रेम-रोमांस का पर्याय बन गया। रोमन ईसाईयों के लिए 14 फरवरी ’विवाह दिवस’ बन गया। अधिकांश युवक-युवती इसी दिन विवाह संस्कार में बंधने लगे।
है सुबह कुछ खास
मंजर भी नवेले वस्त्र में
प्रेमियों की रौनकें
बिखरीं धरा के वृत्त में
इश्क की अनुपम फिजां
आज कुछ आज़ाद है
उड़ चले परवाज़ देखो
डर खुशी के बाद है.
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पुनः भेंट होगी...
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