।। प्रातःवंदन ।।
"जग चला नीड़ खगों का मौन
कहीं से चुपके-चुपके कौन
पहुँच सोई कलियों के पासौ
सिखा जाता है हास-विलास
मुझे केवल इसका है ध्यान!
जगाता है समीर जब भोर
बदल जाता है चारों ओर
दृश्य जग का पहला शृंगार
नया संसार सुरभि संचार
कुतूहल कर जाता है दान..!!"
त्रिलोचन
अखबार के पन्नों पर वो ख़बर ही नहीं जिसे हम, आप खोजें जा रहें हैं...
करोना की फिर नई फ़सल आई है,तो फिर सुहानी भोर की आगाज के साथ
चुनिंदा लिंकों पर नज़र डालें..✍️
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जब नया साल आने को है
हर भोर नयी हर दिवस नया
हर साँझ नयी हर चाँद नया,
हर अनुभुव भी पृथक पूर्व से
हर स्वप्न लिए संदेश नया !...
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अगर आप से पूछा जाए कि आप क्या बनना चाहेंगे? एक कामयाब डॉक्टर, इंजीनियर, एथलीट, नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक या एक करोड़पति ? आपमें से अधिकतर का जवाब करोड़पति बनना होगा। क्यों? क्योंकि यही आज की सच्चाई है। अगर करोड़पति न भी बनना चाहें तो धनवान बनने का सपना तो हर इंसान देखता ही है।
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नदी को जानना आसान नहीं
यूँ ही
एक दिन मैंने नदी से पूछा
"तुम कौन हो,,,,? "
नदी मुस्कुराई
और तंज़ से बोली
"सुनो कविवर,
नदी को सिर्फ...
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जोबन ज्वार ले के आउँगी ........
फिर से सांँझ हो रही है कहांँ हो मेरे हरकारे
कब से अब तक यूँ बैठी हूंँ मैं नदिया किनारे
फिर आज भी कहीं प्यासी ही लौट न जाऊं
तड़के उनींदे नयनों के संग फिर यहीं आऊं
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आ०डॉ. वर्षा सिंह जी..
के साथ आज की प्रस्तुति यहीं तक...
शायरी मेरी सहेली की तरह
मेंहदी वाली हथेली की तरह
हर्फ़ की परतों में खुलती जा रही
ज़िन्दगी जो थी पहेली की तरह...
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।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️




