सादर अभिवादन।
गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-
अप्रतिम सौंदर्य...कुसुम कोठारी
वैचारिकी पेंसिलों को
अपने-अपने
दल,वाद,पंथ के
रेजमाल पर घिसकर
नुकीला बनाने की कला
प्रचलन में है,
सुलेख लिखकर
सर्वश्रेष्ठ अंक पाने की
होड़ में शामिल होने वाले
दोमुँहे बुद्धिजीवियों से
किसी विषय पर
निष्पक्ष मूल्यांकन
और मार्गदर्शन की आशा
हास्यास्पद है।
हवाओं ने चुराकर खुशबू तुम्हारे बालों से
भ्रूणहत्या (कन्या )... जिज्ञासा सिंह
जाने किस बात पे यूँ दिल से निकारी गई मैं
सभी कहते हैं,लड़की एक बोझ होती है
इस दौर में बन,कर्ज उधारी गई मैं
किसान आंदोलन, सत्याग्रह और 'चंपारन मीट हाउस'